डेडलाइन पर ईरान का बड़ा अलर्ट, रक्षात्मक नहीं ‘ऑफेंसिव’ होगा सैन्य रुख?

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हुसैन अफसर
हुसैन अफसर

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों के बीच 17 अगस्त की तारीख सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं रह गई है। 60 दिन की उस समयसीमा के खत्म होने से ठीक पहले ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसा बयान दिया है जिसने कूटनीतिक अनिश्चितता के बीच सैन्य खतरे की परत और मोटी कर दी है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के राजनीतिक उप प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल यदोल्लाह जवानी ने कहा है कि ईरान की सैन्य कार्रवाइयां अब तक भले ही रक्षात्मक प्रकृति की रही हों, लेकिन आगे उनका स्वरूप “ऑफेंसिव” हो सकता है। उन्होंने अमेरिका और इजरायल को “रणनीतिक सरप्राइज” के लिए तैयार रहने की चेतावनी भी दी है।

बयान का टाइमिंग क्यों अहम

जवानी का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच जून में बने अंतरिम समझौते की 60 दिन की समयसीमा समाप्त हो रही है। इस समझौते में दोनों पक्षों के बीच सैन्य गतिविधियां रोकने और अधिक व्यापक अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत का ढांचा तय किया गया था। समझौते के मुताबिक अंतिम डील के लिए अधिकतम 60 दिन का समय रखा गया था और दोनों पक्षों की सहमति से इसे बढ़ाया भी जा सकता था।

लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या यही है कि दोनों पक्ष इस समयसीमा और उसके आगे की प्रक्रिया को एक ही नजर से नहीं देख रहे। ईरान की ओर से 12 अगस्त को कहा गया कि अमेरिका के साथ युद्धविराम बढ़ाने को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरें सामने आई थीं कि दोनों पक्ष समयसीमा बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं, हालांकि विस्तार की अवधि तय नहीं हुई थी। इस विरोधाभास ने कूटनीतिक स्थिति को और धुंधला कर दिया है।

तेहरान का संदेश क्या है

जवानी के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “ऑफेंसिव फॉर्म” है। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि ईरान ने तत्काल किसी नए हमले का आदेश दे दिया है। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई विशिष्ट सैन्य अभियान घोषित नहीं किया गया है। लेकिन बयान यह जरूर संकेत देता है कि ईरान अपने सैन्य विकल्पों की भाषा को बदल रहा है—कम से कम सार्वजनिक संदेश के स्तर पर।

जवानी ने कहा कि नई नियुक्तियों के बाद ईरानी सैन्य कार्रवाई सिद्धांततः रक्षात्मक उद्देश्य से जुड़ी रह सकती है, लेकिन उसका संचालनात्मक रूप अधिक आक्रामक और अप्रत्याशित हो सकता है। “रणनीतिक सरप्राइज” की चेतावनी इसी संदेश को और स्पष्ट करती है। यानी तेहरान अपने विरोधियों को यह बताना चाहता है कि अगला कदम केवल पहले से तय पैटर्न में आने वाला जवाब नहीं भी हो सकता है।

नई सैन्य कमान का संकेत

इस बयान को ईरान की हालिया सैन्य पुनर्संरचना से अलग करके देखना भी मुश्किल है। पिछले दिनों सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने सैन्य और सुरक्षा तंत्र में कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां की हैं। इनमें IRGC और अन्य सुरक्षा संस्थानों के शीर्ष पदों पर बदलाव शामिल हैं। मोहसिन रजाई को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का नया सचिव बनाया गया है और उन्हें सुप्रीम लीडर का प्रतिनिधि भी नियुक्त किया गया है। इस बदलाव की आधिकारिक वजह के तौर पर व्यापक नीति परिवर्तन का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया, लेकिन यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब अमेरिका के साथ तनाव और होर्मुज को लेकर गतिरोध कायम है।

यही वह संदर्भ है जिसमें जवानी का बयान ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। एक तरफ बातचीत और मध्यस्थता के रास्ते खुले होने की बात होती है, दूसरी तरफ ईरान के सुरक्षा तंत्र में ऐसे चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल रही हैं जिनका सैन्य और सुरक्षा प्रतिष्ठान से लंबा जुड़ाव रहा है। इसे सीधे “युद्ध की तैयारी” कहना उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा, लेकिन यह कहना उचित है कि ईरान की सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण पुनर्संयोजन चल रहा है।

60 दिन का समझौता कहां अटका

जून में हुए इस अंतरिम समझौते का मकसद सिर्फ लड़ाई रोकना नहीं था। इसके तहत दोनों पक्षों को व्यापक अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत करनी थी। समझौते में समुद्री आवाजाही, अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी में कमी, ईरानी तेल निर्यात, जमे हुए ईरानी फंड और परमाणु कार्यक्रम जैसे संवेदनशील मुद्दों को आगे की प्रक्रिया से जोड़ा गया था।

लेकिन समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी उसके लागू होने के तरीके में सामने आई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। 12 अगस्त तक ईरान का कहना था कि अमेरिका को पहले समझौते की शर्तों पर वापस आना होगा और अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की समयसीमा तय करनी होगी। तेहरान ने यह भी कहा कि विस्तार को लेकर कोई बातचीत नहीं चल रही।

यानी 17 अगस्त की डेडलाइन के सामने अब सिर्फ “समझौता बढ़ेगा या खत्म होगा” वाला सवाल नहीं है। असली समस्या यह है कि दोनों पक्ष समझौते की मूल शर्तों को लेकर ही अलग-अलग स्थिति में खड़े हैं।

होर्मुज बना सबसे बड़ा दबाव

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील बिंदु स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है। दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है और अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान इसकी आवाजाही लगातार विवाद का केंद्र रही है। जून के समझौते में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल करने की व्यवस्था भी शामिल थी।

ईरान की स्थिति यह रही है कि होर्मुज को पूरी तरह खोलने से पहले अमेरिकी सैन्य दबाव, नाकाबंदी और आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर प्रगति होनी चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिका ने समुद्री मार्ग को लेकर ईरान पर दबाव बनाए रखा है। इस गतिरोध के कारण 60 दिन की बातचीत का सबसे व्यावहारिक परीक्षण भी यही बन गया है—क्या दोनों पक्ष जमीन और समुद्र पर तनाव घटाने के लिए एक-दूसरे की न्यूनतम शर्तें स्वीकार कर सकते हैं?

पाकिस्तान की मध्यस्थता भी परीक्षा में

इस समझौते तक पहुंचने में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। जून में इस्लामाबाद समझौते के बाद पाकिस्तान ने इसे क्षेत्रीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया था और आगे की बातचीत में अपनी भूमिका जारी रखने की बात कही थी।

लेकिन बाद की घटनाओं ने मध्यस्थता की कठिनाई सामने ला दी। जुलाई में पाकिस्तान ने माना था कि समझौते के क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियां पैदा हो रही हैं और दोनों पक्षों से हिंसा रोककर तकनीकी स्तर की बातचीत फिर शुरू करने की अपील की थी। यानी 17 अगस्त की डेडलाइन अब केवल वॉशिंगटन और तेहरान की परीक्षा नहीं है; यह उस मध्यस्थता मॉडल की भी परीक्षा है जिसने दोनों पक्षों को एक अस्थायी ढांचे में लाने की कोशिश की थी।

‘ऑफेंसिव’ का मतलब क्या युद्ध है?

यहां सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है। किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का आक्रामक रुख अपनाने का बयान अपने आप में युद्ध की नई शुरुआत या तत्काल हमले की घोषणा नहीं होता। सैन्य भाषा में ऐसी चेतावनियां प्रतिरोधक क्षमता दिखाने, विरोधी पर दबाव बढ़ाने और संभावित कार्रवाई को लेकर अनिश्चितता पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल होती हैं।

लेकिन इस बयान को पूरी तरह सामान्य बयान मानना भी मुश्किल है। यह उस समय आया है जब 60 दिन की कूटनीतिक समयसीमा समाप्त हो रही है, समझौते के भविष्य पर सहमति नहीं है और ईरान ने हाल के दिनों में यह स्पष्ट किया है कि वह अमेरिकी दबाव में शर्तें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ऐसे में “ऑफेंसिव” और “रणनीतिक सरप्राइज” जैसी भाषा तनाव के अगले चरण के लिए सार्वजनिक चेतावनी के रूप में पढ़ी जा सकती है—हालांकि यह एक विश्लेषणात्मक निष्कर्ष है, आधिकारिक घोषणा नहीं।

अब आगे क्या हो सकता है

17 अगस्त के बाद कम से कम तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं। पहला, दोनों पक्ष किसी नए फॉर्मूले या मध्यस्थता के जरिए मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर सहमत हों। दूसरा, बातचीत औपचारिक रूप से खत्म न हो लेकिन सैन्य और आर्थिक दबाव के बीच अनौपचारिक संपर्क जारी रहे। तीसरा और सबसे जोखिम भरा रास्ता यह होगा कि कूटनीतिक गतिरोध सैन्य संकेतों और जवाबी कार्रवाइयों में बदलने लगे।

इनमें से कौन-सा रास्ता चुना जाएगा, इसका फैसला केवल जवानी के बयान से नहीं किया जा सकता। अमेरिका की अगली कार्रवाई, ईरान की सैन्य तैनाती, होर्मुज में समुद्री गतिविधियां, मध्यस्थों की कोशिशें और दोनों सरकारों के सार्वजनिक बयान ज्यादा निर्णायक संकेत देंगे।