ग्राउंड से गोरखपुर का मिजाज- योगी का गढ़ या अखिलेश की चुनौती?

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

गोरखपुर। पूर्वांचल का यह शहर सिर्फ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ नहीं, बल्कि यूपी की राजनीति का बैरोमीटर भी है। आज यहां अजय कुमार, शीला त्रिपाठी, आदित्य तिवारी, दीपक गुप्ता, श्वेतांक दुबे और अनिल तिवारी से बातचीत हुई। चर्चा योगी बनाम अखिलेश, जातिगत समीकरण और राजनीतिक रसूख पर केंद्रित रही। इनकी बातों से शहर का जो मिजाज उभरा, वह 2027 के चुनाव से पहले कई संकेत देता है।

 

अजय कुमार
योगी का नाम अभी भी भारी है। कानून-व्यवस्था और विकास के नाम पर लोग उन्हें वोट देते हैं। लेकिन शहर में जलभराव और सड़कों की शिकायतें बढ़ी हैं। अखिलेश सैफई का हवाला देकर हमला बोल रहे हैं, लेकिन यहां PDA का नारा अभी जमीन पर उतना नहीं उतर पाया।

शीला त्रिपाठी 
महिलाओं में योगी का समर्थन कायम है। सुरक्षा का मुद्दा सबसे बड़ा है। अखिलेश की बातें सुनाई देती हैं, लेकिन परिवारवाद और पुरानी यादें अभी भी लोगों को पीछे खींचती हैं। रसूख की राजनीति दोनों तरफ है, लेकिन योगी का रसूख मंदिर और प्रशासन दोनों से जुड़ा है।

आदित्य तिवारी 
जाति का गणित यहां हमेशा चलेगा। निषाद, कुर्मी, यादव और सवर्ण—सब अपनी-अपनी गणना कर रहे हैं। योगी ब्राह्मण-ठाकुर और गैर-यादव ओबीसी को साधने में सफल रहे हैं। अखिलेश PDA लेकर आए हैं, लेकिन गोरखपुर में यादव वोट इतना निर्णायक नहीं। युवा रोजगार और महंगाई पूछ रहे हैं।

दीपक गुप्ता 
रसूख की बात करें तो योगी का रसूख साफ दिखता है। प्रशासन पर पकड़ है। अखिलेश की रैलियां होती हैं, लेकिन संगठन की जड़ें कमजोर लगती हैं। 2024 में SP ने प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन गोरखपुर में BJP की दीवार अभी टूटी नहीं है।

श्वेतांक दुबे 
यहां का मिजाज दोहरा है। विकास और सुरक्षा के मुद्दे पर योगी आगे हैं। लेकिन स्थानीय मुद्दे—जल निकासी, सड़क, बिजली—विपक्ष को मौका दे रहे हैं। जाति समीकरण में निषाद वोट दोनों तरफ खिंचाव का कारण बन सकता है। राजनीतिक रसूख अब सिर्फ मंदिर या परिवार से नहीं, बल्कि डिलीवरी से तय हो रहा है।

अनिल तिवारी 
गांवों में योगी का जादुई असर है। अखिलेश की बातें शहर तक ज्यादा सुनाई देती हैं। लेकिन 2027 में सिर्फ रसूख नहीं चलेगा। जो काम दिखाएगा, वही टिकेगा। जाति का गणित बिगड़ा तो नतीजा पलट सकता है। 

गोरखपुर की बातचीत से साफ है कि योगी आदित्यनाथ का प्रभाव अभी मजबूत है, लेकिन स्थानीय शिकायतें और जातिगत समीकरण विपक्ष को जगह दे रहे हैं। अखिलेश यादव PDA और विकास के मुद्दे पर हमला बोल रहे हैं, लेकिन गढ़ में सेंध लगाने के लिए संगठन और भरोसे की जरूरत होगी। 2027 से पहले गोरखपुर का मिजाज बता रहा है—रसूख अब सिर्फ नाम का नहीं, काम का भी होना चाहिए।

गोरखपुर में जाति समीकरण का

गोरखपुर पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र है और यहां जाति समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ में सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी, निषाद और दलित वोटों का मिश्रण BJP की ताकत रहा है, जबकि समाजवादी पार्टी PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) और यादव-मुस्लिम समीकरण पर जोर देती है। ग्राउंड चर्चाओं और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर समीकरण का विश्लेषण इस प्रकार है:प्रमुख जाति समूह और अनुमानित प्रभावगोरखपुर लोकसभा क्षेत्र (और आसपास की विधानसभा सीटों) में पारंपरिक रूप से:

  • निषाद (मल्लाह/केवट): करीब 20-23 प्रतिशत। यह सबसे निर्णायक समूह माना जाता है। 2018 उपचुनाव में SP-BSP गठबंधन की जीत में निषाद वोट महत्वपूर्ण रहे थे। बाद में निषाद पार्टी BJP के साथ चली गई, जिससे समीकरण बदला।
  • दलित (जाटव और गैर-जाटव): लगभग 18 प्रतिशत। जाटव वोट पारंपरिक रूप से बसपा की ओर झुकते रहे, लेकिन हाल के चुनावों में बंटे हैं।
  • मुस्लिम: करीब 15-18 प्रतिशत। ये ज्यादातर SP या विपक्षी गठबंधन के साथ जाते हैं।
  • यादव: करीब 8-10 प्रतिशत। SP का कोर वोट बैंक।
  • सवर्ण (ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार): 15-20 प्रतिशत के आसपास। BJP का मजबूत आधार।
  • अन्य ओबीसी (कुर्मी, सैंथवार, राजभर आदि): महत्वपूर्ण हिस्सेदारी। BJP इन्हें साधने में सक्रिय रही है।

BJP का समीकरणBJP यहां सवर्ण + गैर-यादव ओबीसी + निषाद के हिस्से पर निर्भर रही है। योगी आदित्यनाथ की छवि और गोरखनाथ मंदिर का प्रभाव सवर्ण और कुछ ओबीसी वोटों को एकजुट रखता है। 2024 लोकसभा में भी पार्टी ने ऊपरी जातियों और कुर्मी-निषाद जैसे समूहों को प्राथमिकता दी। हाल के संगठनात्मक बदलावों में गैर-यादव ओबीसी को जगह देकर PDA को काउंटर करने की कोशिश दिखती है।SP का समीकरणअखिलेश यादव का फोकस PDA पर है—पिछड़े (गैर-यादव ओबीसी), दलित और अल्पसंख्यक। यादव-मुस्लिम कोर के साथ निषाद और कुछ दलित वोटों को जोड़ने की कोशिश जारी है। 2024 में प्रदेश स्तर पर गैर-जाटव और कुछ ओबीसी वोटों में बढ़त मिली थी, लेकिन गोरखपुर जैसे गढ़ में यह अभी सीमित प्रभाव दिखा।वर्तमान चुनौतियां और बदलाव

  • निषाद वोट: दोनों पार्टियों के लिए स्विंग फैक्टर। BJP के साथ गठबंधन के बाद इनका रुझान महत्वपूर्ण है।
  • स्थानीय मुद्दे बनाम जाति: जलभराव, विकास और रोजगार जैसे मुद्दे जाति समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। युवा और महिला मतदाता अब सिर्फ जाति नहीं, डिलीवरी भी देखते हैं।
  • रसूख बनाम संगठन: योगी का व्यक्तिगत और संस्थागत रसूख BJP को फायदा पहुंचाता है, जबकि SP को जमीनी संगठन मजबूत करने की जरूरत है।

Ground Report Note: यह रिपोर्ट 25–30 सितंबर 2026 के दौरान गोरखपुर शहर में स्थानीय नागरिकों, युवाओं, व्यापारियों और अन्य लोगों से बातचीत पर आधारित है। प्रस्तुत प्रतिक्रियाएं संबंधित लोगों के व्यक्तिगत विचार हैं और इन्हें पूरे मतदाता वर्ग की राय नहीं माना जाना चाहिए।