‘फारूक मियां! जो खुद डूब रहा हो, वह किसी और को कैसे बचाएगा?’

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ASHISH SHARMA RISHI
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नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का बारामूला में दिया गया बयान न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि गहरी चिंता का विषय भी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दा उठाकर कश्मीरियों की “रक्षा” कर रहा है। उनके अनुसार, अगर पड़ोसी देश यह शोर न मचाता तो दिल्ली की नीयत अच्छी नहीं होती।

यह बयान किसी जिम्मेदार भारतीय नेता के मुंह से निकलना शर्मनाक है। यह न केवल भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाता है, बल्कि उस देश की तारीफ करता है जो खुद अपनी जनता को सही मायनों में कुछ नहीं दे पा रहा।

पाकिस्तान की हकीकत आंकड़ों में

विश्व बैंक के अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में करीब 12 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। यानी लगभग आधी आबादी। प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर मात्र 1.6 प्रतिशत के आसपास है, जो गरीबी कम करने के लिए बेहद नाकाफी है। देश लगातार आईएमएफ के कर्ज और शर्तों पर निर्भर है। विदेशी कर्ज 130 अरब डॉलर के पार है। बिजली-गैस संकट, महंगाई और बेरोजगारी आम बात हो गई है।

यह वही पाकिस्तान है जो अपनी अर्थव्यवस्था संभालने में नाकाम है, लेकिन कश्मीर के नाम पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाता रहता है। जो देश अपने नागरिकों को रोटी, बिजली और सुरक्षा नहीं दे सकता, वह दूसरों की “रक्षा” कैसे करेगा?

पीओके की बदहाली

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) की स्थिति और भी दयनीय है। वहां के लोग बार-बार इस्लामाबाद के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं का अभाव, राजनीतिक अधिकारों का दमन और आर्थिक उपेक्षा आम शिकायतें हैं। पीओके में न तो वास्तविक लोकतंत्र है और न ही विकास। वहां के युवा रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में अक्सर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों या विदेश का रुख करते हैं।

अगर पाकिस्तान सच में कश्मीरियों का हितैषी होता, तो पहले पीओके में रहने वाले लोगों की स्थिति सुधारता। लेकिन वहां तो “आजाद कश्मीर” का नारा सिर्फ प्रोपगैंडा तक सीमित रह गया है। हकीकत में वह इलाका पाकिस्तान की फौजी और राजनीतिक मशीनरी के नियंत्रण में है।

फारूक अब्दुल्ला का दोहरा मापदंड

फारूक अब्दुल्ला बार-बार कहते हैं कि कश्मीरी भारत के अभिन्न अंग हैं। वे गांधी, नेहरू और आजाद के भारत की बात करते हैं। लेकिन उसी सांस में पाकिस्तान को रक्षक बताना विरोधाभास ही नहीं, राजनीतिक आत्मघात है। यह बयान उन ताकतों को बल देता है जो कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश में लगे हैं।

कश्मीर की असली सुरक्षा भारत की संवैधानिक व्यवस्था, सुरक्षा बलों की कुर्बानी और विकास कार्यों से होती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का शोर न तो कश्मीरियों को रोटी देता है और न सुरक्षा। वह सिर्फ अपने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एजेंडे को आगे बढ़ाने का औजार है।

जो व्यक्ति या देश खुद संकट में हो, वह दूसरों का रक्षक नहीं बन सकता। पाकिस्तान आज आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। उसकी “मदद” का दावा करना या तो अज्ञान है या फिर जानबूझकर भारत की एकता को कमजोर करने वाला बयान।

फारूक अब्दुल्ला जैसे नेताओं को समझना चाहिए कि कश्मीर की समस्या का समाधान दिल्ली में है, इस्लामाबाद में नहीं। पाकिस्तान की “रक्षा” का भ्रम पालना कश्मीरियों के साथ सबसे बड़ा अन्याय है। जो खुद नहीं बच सकता, वह किसी और को कैसे बचाएगा?