सऊदी की मदद को मिस्र तैयार, क्या हूतियों के खिलाफ खुलेगा नया मोर्चा?

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) द्वारा लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच सऊदी अरब को एक बड़ा रक्षात्मक समर्थन मिला है। इजिप्ट (मिस्र) की संसद ने राष्ट्रपति अब्दुल फत्ताह अल-सिसी (Abdul Fattah Al Sissi) के उस अनुरोध को मंजूरी दे दी है, जिसमें जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब को सैन्य सहायता प्रदान करने की बात कही गई थी।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सऊदी अरब मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (Mecca Joint Defence Agreement) के तहत पाकिस्तान और तुर्की के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है। इजिप्ट इस समझौते का हिस्सा नहीं है, लेकिन वह ‘R4’ कूटनीतिक समूह के माध्यम से इन तीनों देशों के संपर्क में रहता है।

इजिप्ट के इस फैसले से जुड़े छह अहम सवालों पर एक नजर:

1. इजिप्ट का यह फैसला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? अरब जगत में इजिप्ट की सेना सबसे बड़ी है और उसके पास जबरदस्त वायु, नौसेना और हवाई रक्षा क्षमताएं हैं। 2015 में काहिरा (इजिप्ट) ने यमन के हूतियों के खिलाफ सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन में हिस्सा लिया था। हालांकि, इस बार राष्ट्रपति अल-सिसी ने स्पष्ट किया है कि वे यमन के खिलाफ किसी आक्रामक अभियान में हिस्सा नहीं लेंगे, बल्कि उनका ध्यान विशेष रूप से सऊदी अरब की सीमा और क्षेत्र की रक्षा पर होगा।

2. इजिप्ट सऊदी अरब की रक्षा कैसे मजबूत कर सकता है? इजिप्ट अपनी वायु रक्षा प्रणाली, निगरानी क्षमताओं, लड़ाकू विमानों और नौसैनिक समर्थन के जरिए सऊदी अरब के हवाई अड्डों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और सीमाओं को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है। रेड सी (लाल सागर) में इजिप्ट का अनुभव भी अहम साबित हो सकता है, क्योंकि हूती लगातार बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के पास जहाजों पर हमले कर रहे हैं। हालांकि, रॉयल्स यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के डॉ. एच.ए. हेलियर के मुताबिक, सऊदी अरब इजिप्ट से मुख्य रूप से ‘राजनीतिक और प्रतीकात्मक समर्थन’ चाहता है।

3. पाकिस्तान और तुर्की इस संघर्ष को कैसे बदल सकते हैं? इजिप्ट के विपरीत, पाकिस्तान और तुर्की मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के सदस्य हैं। पाकिस्तान का सऊदी के साथ पुराना सैन्य संबंध है, जबकि तुर्की तकनीकी विशेषज्ञता, ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक में माहिर है। ये दोनों देश मिलकर हूती मिसाइलों और ड्रोनों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने की सऊदी अरब की क्षमता को काफी हद तक बढ़ा सकते हैं। दोनों देशों ने यमन के खिलाफ आक्रामक अभियानों के बजाय केवल रक्षात्मक सहयोग पर जोर दिया है।

4. क्या इजिप्ट ‘मक्का समझौते’ का चौथा सदस्य बनेगा? फिलहाल यह अनिश्चित है। इजिप्ट क्षेत्रीय सुरक्षा पर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के साथ समन्वय जरूर कर रहा है, लेकिन वह इस रक्षा समझौते का सदस्य नहीं है। इजिप्ट औपचारिक रूप से समझौते में शामिल हुए बिना भी रियाद (सऊदी अरब) को सैन्य सहायता दे सकता है, जिससे वह अपने फैसलों में लचीलापन बरकरार रख सकेगा।

5. इस संघर्ष में इजिप्ट का सीधा हित क्या है? सऊदी अरब इजिप्ट का बड़ा आर्थिक मददगार रहा है। हूतियों के हमले और लाल सागर में व्यवधान इजिप्ट की अर्थव्यवस्था के दो सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं— स्वेज नहर की आय और सऊदी में काम करने वाले इजिप्ट के नागरिकों की रेमिटेंस (Remittances)। पिछले साल सऊदी में काम करने वाले इजिप्शियन नागरिकों ने 12 बिलियन डॉलर भेजे थे। इसलिए, सऊदी अरब की रक्षा करना सीधे तौर पर इजिप्ट के आर्थिक हितों की रक्षा करना भी है।

6. क्या यह मजबूत गठबंधन हूतियों को रोकेगा या युद्ध को और बढ़ाएगा? सऊदी अरब, इजिप्ट, पाकिस्तान और तुर्की का समन्वित रक्षा नेटवर्क हूती हमलों को काफी हद तक बेअसर कर सकता है। लेकिन अगर इन देशों के सैनिक सीधे युद्ध में शामिल होते हैं, तो संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है, जो पहले ही अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़ा हुआ है।

हालांकि, कूटनीतिक रास्ते भी खुले हुए हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की तनाव कम करने के लिए तेहरान में ईरानी नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। देखना यह है कि क्या यह नया सैन्य सुरक्षा चक्र हूतियों के हमलों को बिना युद्ध बढ़ाए रोक पाएगा।