राजा का बेटा ही राजा होगा’ का नैरेटिव, दीपांशु की जीत ने बदली कहानी

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अजमल शाह
अजमल शाह

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव 2026 के नतीजे आ गए। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का सूपड़ा साफ। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—चारों सीटें हाथ से गईं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने तीन सीटें जीतीं। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने धमाकेदार जीत दर्ज की। काउंटिंग के दौरान कई बार एनएसयूआई आगे दिखी, लेकिन अंतिम पारी में तस्वीर पलट गई। यह हार सिर्फ वोटों की हार नहीं थी। यह उस मानसिकता की हार थी जो आज भी कांग्रेस की राजनीति में गहरे बैठी है—‘राजा का बेटा ही राजा होगा, फिर भले वो कमजोर और कुपोषित क्यों न हो’।नतीजे एक नजर में

अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के यश डबास ने एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 2053 वोटों से हराया। उपाध्यक्ष पर दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर एकतरफा जीत दर्ज की। एबीवीपी के इशु मौर्या दूसरे और एनएसयूआई के वीर चतरथ महज 4313 वोटों के साथ बुरी तरह पीछे रह गए। सचिव पद पर एबीवीपी की रिया छावड़ी ने आसानी से जीत हासिल की। संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी के लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव दूसरे और एनएसयूआई के गोपाल चौधरी तीसरे स्थान पर रहे।वो चूक जिसने सब बिगाड़ दिया

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन और सत्य निकेतन हादसे ने एनएसयूआई को नैतिक बढ़त दी थी। कैंपस में माहौल सत्ता-विरोधी लग रहा था। लेकिन टिकट वितरण में हुई एक बड़ी चूक ने सारे समीकरण बदल दिए।दीपांशु शौकीन चार साल से एनएसयूआई के बैनर तले काम कर रहे थे। सामान्य परिवार से आने वाले दीपांशु के पिता डीटीसी में डेली वेज कंडक्टर हैं। पिछले साल भी उन्हें टिकट नहीं मिला था। इस बार नाम की चर्चा हुई, घोषणा तक होने की बात कही गई, लेकिन आखिर में टिकट वीर चतरथ को दे दिया गया। वीर, कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी मनीष चतरथ के बेटे हैं। मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि, परिवार का पुराना कांग्रेस से नाता और राहुल गांधी के साथ तस्वीरें—सब कुछ था। बस कैंपस में जमीनी पहचान और छात्रों के बीच मेहनत की वह पूंजी नहीं थी, जो दीपांशु के पास थी।दीपांशु निर्दलीय मैदान में उतरे। सत्य निकेतन हादसे के बाद उन्होंने जूते-चप्पल त्याग दिए और नंगे पैर कैंपस में घूम-घूमकर न्याय की मांग और प्रचार किया। छात्रों ने उन्हें पहचाना। नतीजा—उपाध्यक्ष पद पर ऐतिहासिक जीत।‘राजा का बेटा’ वाला नैरेटिव कैसे फैला

दीपांशु का टिकट कटते ही कैंपस में एक बात फैल गई—यहां भी वही पुरानी रीत। मेहनत करने वाले को किनारे किया गया, परिवार वाले को आगे बढ़ाया गया। ‘राजा का बेटा ही राजा बनेगा’ वाला नैरेटिव सिर्फ उपाध्यक्ष पद तक सीमित नहीं रहा। उसने पूरे एनएसयूआई पैनल को नुकसान पहुंचाया। छात्रों ने महसूस किया कि संगठन अब भी योग्यता से ज्यादा रिश्तेदारी देखता है।इसी तरह विशेष यादव भी टिकट के प्रबल दावेदार थे। उन्हें मौका नहीं मिला। वे निर्दलीय (समाजवादी छात्र सभा के समर्थन से) लड़े और संयुक्त सचिव पद पर एनएसयूआई उम्मीदवार से ज्यादा वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे। अगर इन दोनों को मौका दिया गया होता, तो तस्वीर शायद अलग होती—यह बात अब कांग्रेस समर्थक खुद कह रहे हैं।हार से बड़ा सबक

छात्र राजनीति में भी वही बीमारी दिखी जो बड़ी राजनीति में सालों से चली आ रही है। जब संगठन मेहनतकश कार्यकर्ता की बजाय परिवार और पहुंच को प्राथमिकता देता है, तो छात्र उसे आसानी से पढ़ लेते हैं। दीपांशु शौकीन की जीत सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं। यह कैंपस के उस गुस्से की जीत है जो कहता है—काबिलियत को किनारे करके सिर्फ खानदानी रिश्ते से आगे बढ़ाने की नीति अब नहीं चलेगी।एनएसयूआई की यह करारी हार कांग्रेस के लिए आईना है। राजा का बेटा राजा बन सकता है, लेकिन छात्रों के बीच वह ताज तभी स्वीकार होगा जब वह मेहनत और काबिलियत से अर्जित हो। कमजोर और कुपोषित उत्तराधिकारी को सिर्फ खून के आधार पर आगे बढ़ाने की कीमत अब कैंपस भी वसूलने लगा है।