26 जूनियर इंजीनियरों की बर्खास्तगी रद्द, कोर्ट बोला- सजा कर्मचारियों को नहीं

लखनऊ: यूपी जल निगम में 2013 में भर्ती किए गए 26 जूनियर इंजीनियरों को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच से राहत मिली है। कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने कहा कि अगर कर्मचारियों की नियुक्ति स्वीकृत पदों पर नियमित चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी और उनके खिलाफ धोखाधड़ी, गलत जानकारी या चयन में हेरफेर का कोई आरोप नहीं था, तो भर्ती प्रक्रिया में अधिकारियों की गलती या आरक्षण लागू करने में हुई गड़बड़ी का खामियाजा उन्हें नहीं भुगतना चाहिए।
जस्टिस इरशाद अली ने राकेश प्रताप सिंह समेत 25 अन्य की याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कहा कि बाद की प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए पहले से की गई नियुक्तियों को इस आधार पर खत्म करना उचित नहीं था।
470 पदों की भर्ती से शुरू हुआ विवाद
मामला 2013 में यूपी जल निगम में जूनियर इंजीनियरों के 470 पदों पर हुई भर्ती से जुड़ा है। चयन प्रक्रिया के बाद आरक्षित श्रेणियों के कुछ उम्मीदवारों के चयन को लेकर आपत्तियां उठीं। इसके बाद जल निगम के प्रबंध निदेशक ने 7 जनवरी 2014 को कथित अनियमितताओं की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्र ने अदालत में दलील दी कि समिति ने 15 जनवरी 2014 की रिपोर्ट में आरक्षित श्रेणी के छूटे हुए योग्य उम्मीदवारों को दूसरे चरण में उपलब्ध 469 रिक्तियों पर समायोजित करने की सिफारिश की थी। समिति ने यह भी कहा था कि पहले से चयनित सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को सेवा से नहीं हटाया जाना चाहिए।
73 जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं हुई थीं खत्म
अधिकारियों ने आरक्षित श्रेणी के अतिरिक्त उम्मीदवारों को समायोजित करने की सिफारिश स्वीकार कर ली। इसके बाद 136 अतिरिक्त SC/OBC उम्मीदवारों की नियुक्ति की गई। इससे 470 स्वीकृत पदों के मुकाबले कुल नियुक्तियों की संख्या 543 हो गई।
इसके बाद 2 दिसंबर 2014 को राकेश प्रताप सिंह समेत सामान्य श्रेणी के 73 जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। कर्मचारियों ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया। अदालत ने 18 दिसंबर 2014 को बर्खास्तगी के आदेश रद्द करते हुए जल निगम को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया था।
नवीनतम फैसले में हाई कोर्ट ने इस पुराने आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि 18 दिसंबर 2014 के आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी और इसलिए वह जल निगम के लिए बाध्यकारी था। इसके बावजूद बाद की कार्रवाई में पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
आरक्षण लागू करना जरूरी, लेकिन तरीका भी कानूनी हो
हाई कोर्ट ने आरक्षण नीति के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि आरक्षण लागू किया जाना जरूरी है। लेकिन आरक्षण से जुड़ी गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए ऐसा रास्ता नहीं अपनाया जा सकता, जो कानून या मूल चयन प्रक्रिया के खिलाफ हो।
अदालत ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी 2014 के आदेश को भी रद्द कर दिया। कोर्ट के मुताबिक, यह आदेश अधिकार क्षेत्र के बिना जारी किया गया था। ऐसे आदेश के आधार पर बाद में की गई प्रशासनिक कार्रवाई को स्वतंत्र रूप से कायम नहीं रखा जा सकता।
‘कारण बताओ नोटिस महज औपचारिकता नहीं’
अदालत ने बर्खास्तगी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी करना केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। सक्षम अधिकारी को कर्मचारी के जवाब पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और उसमें उठाई गई महत्वपूर्ण आपत्तियों का परीक्षण करना जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया, आरक्षण के प्रावधानों, पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकार क्षेत्र, उपलब्ध रिक्तियों और पहले के हाई कोर्ट के आदेश समेत कई मुद्दे उठाए थे। अदालत के मुताबिक, इन आपत्तियों पर उचित तरीके से विचार किया जाना चाहिए था।
जल निगम की ओर से यह तर्क दिया गया कि अतिरिक्त आरक्षित उम्मीदवारों को जगह देने के लिए सामान्य श्रेणी के कर्मचारियों को हटाना ही एकमात्र विकल्प था। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिक्तियों पर अतिरिक्त उम्मीदवारों को समायोजित किया जा सकता था और वास्तव में उन्हें इस तरह समायोजित किया भी गया।
