स्कूल के बाद भी छुट्टी नहीं! एशिया में प्राइवेट ट्यूशन की होड़ ने बढ़ाई चिंता

ग्रेस 38 साल की हैं। उनके दो बच्चे हैं—एक चार साल का, दूसरा सात साल का। तीन साल की उम्र में ही उन्होंने दोनों को मंदारिन ट्यूशन में डाल दिया था। घर में कोई फर्राटेदार चीनी नहीं बोलता। फिर भी ग्रेस ने यह फैसला लिया। वजह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि वह अदृश्य दबाव है जो एशिया के लाखों माता-पिता को घेरे रहता है—अगर हमने नहीं कराया तो बच्चा पीछे रह जाएगा।
ग्रेस की कहानी सिर्फ सिंगापुर की नहीं है। यह पूरे पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया की उस चुप्पी भरी होड़ की कहानी है, जिसमें माता-पिता जानते हुए भी बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की मशीनरी में धकेल रहे हैं। उन्हें पता है कि इससे बच्चों पर मानसिक बोझ बढ़ रहा है और अमीर-गरीब के बीच की खाई और गहरी हो रही है। फिर भी दौड़ से बाहर निकलना लगभग असंभव लग रहा है।
दोगुना खर्च, दोगुना दबाव
सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिसी स्टडीज के ताजा सर्वे ने इस विरोधाभास को आंकड़ों में बदल दिया है। प्राइमरी स्कूल के बच्चों के 1,500 माता-पिता से पूछा गया तो 10 में से करीब 9 ने माना कि बच्चे प्राइवेट क्लास में बहुत ज्यादा समय बिता रहे हैं। इसके बावजूद 10 में से 7 ने कहा कि अगर पैसे होते तो वे और ज्यादा खर्च करते। आधे माता-पिता ने स्वीकार किया कि वे दूसरों की देखा-देखी दबाव महसूस करते हैं।
नतीजा साफ है। इस साल सिंगापुर के परिवार ट्यूशन पर औसतन 677 सिंगापुरी डॉलर हर महीने खर्च कर रहे हैं। एक दशक पहले यह आंकड़ा 318 डॉलर था—यानी दोगुना से ज्यादा। हाउस ऑफ हाउज जैसी ट्यूशन सेंटर्स की वेटिंग लिस्ट में एक हजार से ज्यादा नाम हैं। मांग इतनी है कि सप्लाई पीछे छूट रही है।
‘एजुकेशनल आर्म्स रेस’ का कांटेदार सच
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर की अर्थशास्त्री ओंग ई चेंग इस पूरे खेल को एक ‘कांटेदार विरोधाभास’ कहती हैं। उनका तर्क सीधा है—“अगर कोई भी अपने बच्चे को ट्यूशन न भेजे तो सबकी स्थिति बेहतर होगी। लेकिन अगर मैं भेजूं और आप न भेजें तो मेरा बच्चा आगे निकल जाएगा। जब हम दोनों भेजते हैं तो हमारी हालत उस समय से भी खराब हो जाती है जब हमने कुछ नहीं किया होता।”
यही लॉजिक सिंगापुर, चीन और दक्षिण कोरिया में काम कर रहा है। संपन्न परिवार प्राइमरी स्कूल शुरू होने से बहुत पहले ही इस ‘शिक्षा की हथियारों वाली दौड़’ में कूद जाते हैं। तीन-चार साल के बच्चे को अतिरिक्त क्लास में बिठाना अब असामान्य नहीं, बल्कि सामान्य लगने लगा है।
खाई और गहरी हो रही है
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह होड़ सिर्फ क्लासरूम तक सीमित नहीं रह गई है। यह सामाजिक और आर्थिक विभाजन को तेज कर रही है। जिन परिवारों के पास पैसे हैं, उनके बच्चे प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। आगे चलकर अच्छी नौकरियों और अवसरों का रास्ता भी उन्हीं के लिए आसान होता है।
सिंगापुर मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी के नाथन पेंग कहते हैं कि जिन देशों में कम उम्र में ही हाई-स्टेक परीक्षाएं होती हैं, वहां यह खाई और तेजी से फैलती है। “जितनी जल्दी आप बच्चे का टेस्ट लेते हैं, नतीजा उसकी स्कूली शिक्षा से ज्यादा उसके पारिवारिक बैकग्राउंड को दर्शाता है, क्योंकि बच्चे ने औपचारिक शिक्षा प्रणाली में अभी कम समय बिताया होता है।”
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एम. नियाज असदुल्ला मलेशिया का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सरकारी स्कूलों की कमियों के कारण गरीब परिवारों के बच्चे और पीछे छूट रहे हैं। प्राइवेट ट्यूशन का खर्च न उठा पाने की कीमत उन्हें मौकों की कमी के रूप में चुकानी पड़ रही है।
सरकारें क्या कर रही हैं?
एशियाई सरकारों के सामने दोहरी चुनौती है—इस ट्रेंड को रोकना और सरकारी शिक्षा को इतना मजबूत बनाना कि ट्यूशन की जरूरत ही कम हो जाए।
दक्षिण कोरिया में 2024 में परिवारों ने प्राइवेट एजुकेशन पर 29.2 ट्रिलियन वॉन खर्च किए। यह एक दशक में 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। जवाब में सरकार ने तीन साल से कम उम्र के बच्चों के लिए हगवोन (प्राइवेट अकादमी) पर प्रतिबंध लगा दिया है और प्री-स्कूल बच्चों के लिए रोजाना अधिकतम तीन घंटे की सीमा तय कर दी है।
सिंगापुर ने भी कुछ कदम उठाए हैं। 2021 में पीएसएलई की एग्रीगेट स्कोरिंग हटाकर बैंड सिस्टम लागू किया गया। 2024 में फुल सब्जेक्ट-बेस्ड बैंडिंग शुरू की गई ताकि बच्चों पर लगने वाले अकादमिक लेबल कम हों। लेकिन ये सुधार अभी ट्यूशन की होड़ को पूरी तरह थाम नहीं पाए हैं।
आखिरी सवाल
ग्रेस जैसे माता-पिता जानते हैं कि वे सही नहीं कर रहे। फिर भी वे रुक नहीं पा रहे। क्योंकि जब चारों तरफ हर कोई दौड़ रहा हो तो एक माता-पिता के लिए अकेले खड़े रहना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं रह गया कि बच्चे कितना पढ़ें। सवाल यह है कि एशियाई समाज बच्चों की बचपन की कीमत पर ‘आगे निकलने’ की इस होड़ को कब तक चलाता रहेगा। और क्या सरकारें सिर्फ नियम बनाकर इस दौड़ को रोक पाएंगी, या शिक्षा व्यवस्था को इतना भरोसेमंद बनाना होगा कि ट्यूशन की जरूरत ही खत्म हो जाए।

