दहेज उत्पीड़न और मारपीट के आरोपों वाली FIR रद्द, हाईकोर्ट ने बताई वजह

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महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए बेहद अहम और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कम समय तक चलने वाली शादियों के जल्दी टूटने पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि पति-पत्नी के बीच के आपसी मतभेदों को सीधे आपराधिक मामले (Criminal Case) में बदलने की प्रवृत्ति बिल्कुल भी सही नहीं है।

हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि हर तनावपूर्ण, परेशान या असफल वैवाहिक रिश्ते को नियमित रूप से पुलिस केस में तब्दील किया जाने लगा, तो समाज में विवाह जैसी पवित्र व्यवस्था की बुनियाद ही हिल जाएगी। इसी के साथ अदालत ने पति और उसके परिवार वालों के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न की एक एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया।

ढाई महीने में टूटा रिश्ता, तलाक की अर्जी के बाद दर्ज हुई FIR

यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सुनाया। मामला आगरा जिले का है। रिकॉर्ड के मुताबिक, जोड़े की शादी 12 नवंबर 2024 को हुई थी। हालांकि, शादी के महज ढाई महीने बाद 3 फरवरी 2025 को पत्नी अपना ससुराल छोड़कर मायके चली गई।

इसके बाद पति ने 3 मई 2025 को सक्षम पारिवारिक न्यायालय (Family Court) में तलाक के लिए अर्जी दायर कर दी। पति के तलाक की याचिका दाखिल करने के करीब दो महीने बाद, 30 जून 2025 को पत्नी की ओर से आगरा के हरी पर्वत थाने में पति और उसके पूरे परिवार के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई।

एफआईआर में अतिरिक्त दहेज की मांग करने, शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने, खाना न देने, धमकियां देने, स्त्रीधन अपने पास रख लेने और गला दबाकर हत्या की कोशिश करने जैसे बेहद संगीन आरोप लगाए गए थे।

‘आरोप अस्पष्ट और सामान्य’, मेडिकल या पुलिस का कोई साक्ष्य नहीं

जब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो खंडपीठ ने दस्तावेजों की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने पाया कि ढाई महीने के साथ रहने के दौरान पत्नी या उसके परिवार की तरफ से घरेलू हिंसा (Domestic Violence) की कोई शिकायत नहीं की गई थी। न ही पुलिस कंट्रोल रूम को कोई कॉल की गई और न ही मारपीट से जुड़ा कोई मेडिकल साक्ष्य पेश किया गया था।

अदालत ने रेखांकित किया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से सामान्य (General) और अस्पष्ट प्रकृति के थे। एफआईआर में यह कहीं स्पष्ट नहीं था कि किस व्यक्ति ने, कब, कहां और किस परिस्थिति में दहेज की मांग की या प्रताड़ित किया।

‘आपराधिक कानून प्रतिशोध का उपकरण नहीं’

इन तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि एक विवाह टूट गया है या उसमें दरार आ गई है, आपराधिक कानून (Criminal Law) का इस्तेमाल प्रतिशोध या दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के उपकरण (Tool of Harassment) के रूप में नहीं किया जा सकता।

अदालत ने तुरंत प्रभाव से पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त (Quash) कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर रद्द होने से संबंधित वैवाहिक और तलाक के मुकदमों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।