आगरा की सीटों का गणित, BSP के दौर से BJP के 9-0 तक बदली तस्वीर?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की हलचल तेज होने लगी है। इस चुनावी बिसात में ताजनगरी आगरा का राजनीतिक महत्व हमेशा से खास रहा है। कभी बहुजन समाज पार्टी (BSP) का मजबूत गढ़ रहे आगरा में 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिले की सभी 9 सीटों पर जीत दर्ज कर इसे अपना अभेद्य किला बना लिया है।
आगामी 2027 के चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्षी दल इस बार बीजेपी के इस 9-0 के रिकॉर्ड में सेंध लगा पाएंगे, या भगवा दल अपनी पकड़ बरकरार रखेगा।
2012 से 2022 तक: कैसे बदला आगरा का चुनावी मिजाज?
आगरा के पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े जिले की बदलती सियासी हवा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं:
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2012 का चुनाव: जिले में बसपा का एकतरफा दबदबा था। 9 में से 6 सीटों पर बसपा ने जीत दर्ज की थी, जबकि बीजेपी को केवल 2 सीटें मिली थीं और 1 सीट सपा के खाते में गई थी।
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2017 का चुनाव: मोदी लहर के असर से समीकरण पूरी तरह पलट गए। बीजेपी ने सभी 9 सीटों पर जीत का परचम लहराया।
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2022 का चुनाव: सत्ता विरोधी रुझान की चर्चाओं के बावजूद बीजेपी ने दोबारा इतिहास दोहराया और 9 की 9 सीटों पर कब्जा जमाए रखा।
शहरी सीटें: आगरा नॉर्थ, साउथ और कैंट में बीजेपी का दबदबा
शहरी आगरा की तीनों सीटों पर लंबे समय से बीजेपी की मजबूत पकड़ रही है।
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आगरा नॉर्थ: यह सीट बीजेपी के सबसे मजबूत पारंपरिक गढ़ों में गिनी जाती है। 1985 से लेकर अब तक यहां लगातार बीजेपी जीतती आ रही है। 2022 के चुनाव में पार्टी उम्मीदवार ने यहां 1,12,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी, जो पूरे उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जीत अंतरों में शामिल था।
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आगरा साउथ: पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र वाले इस इलाके में योगेंद्र उपाध्याय लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे हैं।
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आगरा कैंट: छावनी और सरकारी दफ्तरों से जुड़ा यह इलाका 2012 में बसपा ने करीब 6 हजार वोटों से जीता था। लेकिन 2017 और 2022 में बीजेपी के डॉ. धर्मेश ने लगातार दो बार जीत दर्ज कर इसे पार्टी के खाते में बनाए रखा।
ग्रामीण और मिश्रित सीटें: एत्मादपुर, आगरा रूरल और खेरागढ़
शहरी इलाकों से हटकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे हमेशा प्रभावी रहे हैं।
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एत्मादपुर: उद्योग और कृषि के मिले-जुले स्वरूप वाली इस सीट से डॉ. धर्मपाल सिंह 2012 में बसपा के टिकट पर जीते थे, जबकि 2022 में वह बीजेपी के टिकट पर विधानसभा पहुंचे।
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आगरा रूरल: 93 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी वाली इस सीट पर खेती और जाटव मतदाताओं का बड़ा आधार है। 2022 में उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल और आगरा की पूर्व मेयर बेबीरानी मौर्य ने यहां से चुनाव लड़कर 76 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी।
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खेरागढ़: पूरी तरह ग्रामीण परिवेश और खेती-पशुपालन पर आधारित इस सीट पर 2022 में एक अलग समीकरण देखने को मिला, जहां बीजेपी के मुकाबले दूसरे नंबर पर सपा या बसपा नहीं, बल्कि कांग्रेस रही थी।
फतेहपुर सीकरी, फतेहाबाद और बाह का राजनीतिक समीकरण
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फतेहपुर सीकरी: ऐतिहासिक महत्व वाली इस सीट पर जाट मतदाताओं की संख्या खासी निर्णायक रहती है। 2022 में यहां राष्ट्रीय लोकदल (RLD) दूसरे स्थान पर रही थी। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बीजेपी-आरएलडी समीकरणों के चलते 2027 में इस सीट पर सबकी नजर रहेगी।
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फतेहाबाद: आगरा और इटावा के बीच स्थित इस तहसील क्षेत्र में सपा मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने रही है। 2017 और 2022 दोनों चुनावों में यहां दूसरे नंबर पर सपा रही, जिससे यह सीट सीधी लड़ाई वाली मानी जाती है।
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बाह: चंबल और यमुना के कछार में मध्य प्रदेश सीमा से सटा बाह ऐतिहासिक रूप से भदावर रियासत के प्रभाव वाला क्षेत्र रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक गांव भी इसी क्षेत्र में है। यहां की राजनीति एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है—2012 में राजा महेंद्र अरिदमन सिंह सपा के टिकट पर जीते, जबकि 2017 और 2022 में उनकी पत्नी रानी पक्षालिका सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की।
2012 में बसपा के दबदबे से निकलकर 2017 और 2022 में बीजेपी का एकतरफा गढ़ बन चुका आगरा अब 2027 के चुनाव की दहलीज पर खड़ा है, जहां विपक्षी दलों के लिए इस मजबूत किले को भेदना सबसे बड़ी चुनौती होगा।

