ईरान से तनाव के बीच खाड़ी देशों का तेल निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर पर लौटा

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने मध्य पूर्व के तेल आपूर्ति नेटवर्क को पूरी तरह बदल दिया है। तेहरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले शिपिंग को बाधित करने की कोशिशों के बावजूद तेल का फ्लो नहीं रुका है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने वैकल्पिक पाइपलाइनों और ऑफशोर ट्रांसफर का इस्तेमाल कर नया रास्ता तैयार कर लिया है।

एनर्जी इंटेलिजेंस फर्म केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले की तुलना में अब मध्य पूर्व से अधिक तेल बाहर जा रहा है। युद्ध से पहले तेल निर्यात 23.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bopd) था, जो 18 अक्टूबर वाले हफ्ते में 24.6 मिलियन बैरल को पार कर गया। इसमें ईरान का निर्यात शामिल नहीं है, जिस पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हैं।

पाइपलाइन के जरिए बाईपास हो रहा हॉर्मुज

निर्यात की मात्रा में रिकवरी हुई है, लेकिन रास्ते बदल गए हैं। सितंबर में इस क्षेत्र का 40% कच्चा तेल हॉर्मुज को बाईपास करते हुए बाहर निकला। युद्ध से पहले यह आंकड़ा महज 17% था।

सعودी अरब ने अपनी 1,201 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (पेट्रोलाइन) का इस्तेमाल तेज कर दिया है, जो पूर्वी प्रांत के खेतों से लाल सागर पर स्थित यानबू (Yanbu) टर्मिनल तक जाती है। वहीं, यूएई ने हॉर्मुज के बाहर मौजूद अपनी 406 किलोमीटर लंबी हबशान-फुजैरा (Habshan–Fujairah) तेल पाइपलाइन के जरिए आपूर्ति बढ़ा दी है।

वर्तमान में निर्यात मुख्य रूप से तीन रास्तों में बंट गया है:

  • 60%: हॉर्मुज जलडमरूमध्य (मुख्यतः शटल टैंकरों के जरिए)

  • 23%: ओमान की खाड़ी (मुख्य रूप से यूएई के फुजैरा में लोडिंग)

  • 17%: लाल सागर (सऊदी अरब के लाल सागर निर्यात नेटवर्क के जरिए)

समुद्र के बीच शिप-टू-शिप ट्रांसफर

इस नए सिस्टम में गहरे समुद्र में तेल का ट्रांसफर (Ship-to-ship transfer) एक अहम कड़ी बन गया है। टैंकर खाड़ी के अंदर से तेल भरते हैं और हॉर्मुज पार करते समय अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। इसके बाद वे फुजैरा या सोहर के पास दूसरे बड़े जहाजों (VLCCs) में कार्गो ट्रांसफर करते हैं। केप्लर के मुताबिक, अगस्त में हॉर्मुज पार करने वाले 70% से अधिक कच्चे तेल को गहरे समुद्र में ही दूसरे जहाजों में शिफ्ट किया गया। ये बड़े जहाज हर 16 दिन में शटल यात्राएं कर रहे हैं।

बढ़ा मालभाड़ा और जोखिम प्रीमियम

हॉर्मुज पर निर्भरता कम होने के बाद भी निर्यात का यह नया तरीका आसान या सस्ता नहीं है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) और फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, शिपिंग पर ईरानी हमलों और टकराव बढ़ने के खतरे ने इस पूरी प्रक्रिया को महंगा कर दिया है। टैंकर चार्टर दरें और वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम (War-risk insurance premiums) में भारी उछाल आया है, जिससे वैकल्पिक रास्तों से तेल भेजना अब काफी खर्चीला हो गया है।