क्या कनाडा टूटने की राह पर है? अल्बर्टा में आज अहम मतदान, ये है मामला

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Jyoti Atmaram Ghag
Jyoti Atmaram Ghag

कनाडा का अल्बर्टा प्रांत सोमवार को यह तय करेगा कि वह देश से अलग होने के लिए एक बाध्यकारी जनमत संग्रह (Binding Referendum) की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है या नहीं। इस वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने चेतावनी दी है कि अलगाववादियों की जीत अमेरिका के साथ चल रहे ‘ट्रेड वॉर’ के बीच देश में खतरनाक अनिश्चितता पैदा करेगी।

ओपिनियन पोल्स के मुताबिक, पश्चिमी कनाडाई प्रांत अल्बर्टा में एक चौथाई से भी कम लोग स्वतंत्रता का समर्थन कर रहे हैं। इसके बावजूद वोटिंग प्रतिशत (Turnout) पर खास नजर है, क्योंकि कम वोटिंग का फायदा अलगाववादी खेमे को मिल सकता है।

ट्रंप की नीतियां और कार्नी की चेतावनी

गुरुवार को एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा, “किसी को भी यह कहने न दें कि फैसला पहले ही हो चुका है। वोटिंग प्रतिशत ही नतीजे तय करेगा।” अल्बर्टा में पले-बढ़े कार्नी ने इस जनमत संग्रह को एक ‘खतरनाक ब्लफ’ करार दिया।

उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ और विलय (Annexation) की धमकियों का जिक्र करते हुए कहा कि इनका मकसद कनाडाई संकल्प को तोड़ना है। कार्नी ने मतदाताओं से अपील की, “ऐसे वोट करें जैसे कनाडा का भविष्य इस पर निर्भर करता है, क्योंकि यह सचमुच करता है।”

अलगाववाद की जड़: तेल उद्योग और ट्रूडो से नाराजगी

अल्बर्टा में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। यहां अलगाववादी भावना मुख्य रूप से ओटावा (केंद्र सरकार) द्वारा तेल सेक्टर के प्रबंधन को लेकर पैदा हुए गुस्से से प्रेरित है। कई अल्बर्टा निवासी पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से इस बात को लेकर नाराज रहे हैं कि उन्होंने अपने जलवायु एजेंडे (Pro-climate agenda) को आगे बढ़ाने के लिए तेल उत्पादन को दबाने की कोशिश की।

अल्बर्टा की प्रीमियर (मुख्यमंत्री) डेनियल स्मिथ ने इसी महीने एक पॉडकास्ट में कहा, “अगर आप मुझसे पूछें कि अलगाववादी भावना के लिए कौन जिम्मेदार है, तो मुझे लगता है कि वे जस्टिन ट्रूडो हैं।” एडमॉन्टन में शनिवार को हुई अलगाववादियों की एक रैली में 61 वर्षीय सैंडी मार्टेल ने एएफपी को बताया कि तेल उद्योग से जुड़े लोग खुद को “लूटा हुआ और ठगा हुआ” महसूस करते हैं।

रूढ़िवादी नेता डेनियल स्मिथ का कहना है कि वह अल्बर्टा को कनाडा का हिस्सा बनाए रखना चाहती हैं, लेकिन उन्होंने इस विभाजनकारी मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए यह जनमत संग्रह बुलाया है। उनका रुख साफ है कि अगर अलगाव के पक्ष में बहुमत आता है, तो वह बाध्यकारी जनमत संग्रह की ओर बढ़ेंगी। अगर संघवादी (Federalists) जीतते हैं, तो यह मुद्दा बंद माना जाएगा।

ब्रेक्जिट से तुलना और आर्थिक झटके का डर

मार्क कार्नी बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर रह चुके हैं और उन्होंने ब्रेक्जिट (Brexit) के दौरान के आर्थिक उतार-चढ़ाव को करीब से देखा है। उन्होंने उसी अनुभव का हवाला देते हुए अल्बर्टा के लोगों को चेतावनी दी है। कार्नी ने कैलगरी के एक टेलीविजन स्टेशन से कहा, “उस समय यह साफ नहीं था कि ‘ब्रेक्जिट’ का असल मतलब क्या है। इसके बाद के कुछ सालों तक भारी अनिश्चितता रही, निवेश रुक गया और अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन गिर गया।”

मस्क और ट्रंप के करीबियों का दखल

जनमत संग्रह की इस प्रक्रिया में विदेशी दखल के भी आरोप लग रहे हैं। अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने जनवरी में अल्बर्टा को अमेरिका का “स्वाभाविक भागीदार” (Natural partner) बताया था। वहीं, 5 अक्टूबर को क्यूबेक प्रांतीय चुनाव में एक अलगाववादी पार्टी की जीत के बाद टेक अरबपति एलन मस्क ने ‘एक्स’ (X) पर लिखा था कि अगर वे अलग हो जाएं तो उनके लिए बेहतर होगा। मस्क ने यह भी जोड़ा, “अल्बर्टा और सस्केचेवान को भी अलग हो जाना चाहिए।”

कथित विदेशी हस्तक्षेप के सवाल पर कार्नी ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका सहित किसी भी विदेशी सरकार को कनाडा के चुनावों में शामिल नहीं होना चाहिए।

क्या है बैलेट का 10वां सवाल?

सोमवार को हो रहे जनमत संग्रह के बैलेट में कुल 10 सवाल हैं, जिनमें आव्रजन (Immigration) से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। लेकिन मुख्य फोकस 10वें सवाल पर है: “क्या अल्बर्टा को कनाडा का प्रांत बने रहना चाहिए?” या प्रांत को निश्चित स्वतंत्रता के लिए कानूनी कदम उठाने चाहिए?

चुनाव प्राधिकरण के अनुसार, सबसे पहले इसी 10वें सवाल की गिनती होगी और मंगलवार तड़के नतीजे आने की उम्मीद है। चुनाव से पहले AI द्वारा तैयार किए गए भ्रामक कंटेंट को लेकर भी चिंताएं रही हैं। मैकगिल यूनिवर्सिटी की मीडिया इकोसिस्टम ऑब्जर्वेटरी के निदेशक एंगस ब्रिजमैन ने आशंका जताई है कि नतीजे जो भी हों, चुनाव प्रक्रिया को ‘चोरी हुआ’ या ‘अनुचित’ करार देने वाला एक वर्ग जरूर सामने आएगा।

यह पूरी वोटिंग प्रक्रिया ऐसे समय हो रही है जब कुछ ही दिन पहले प्रांत के एक सैन्य बेस में लगी भीषण आग में कम से कम चार सैनिकों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए।