PDA की सियासी ताकत को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है? क्या हैं संकेत

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

 उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन दशक से यह स्थापित सच रहा है कि किसी भी दल को सिर्फ मौजूदा सत्ता या तात्कालिक सर्वे के आधार पर कमजोर मान लेना रणनीतिक चूक है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने समाजवादी पार्टी (सपा) के संदर्भ में इसी सच को मजबूती से दोहराया है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में 2017 और 2019 की चुनावी हार के बाद जिन विश्लेषकों ने सपा को हाशिए पर मान लिया था, उन्हें 2024 के नतीजों ने अपना हिसाब-किताब फिर से करने पर मजबूर कर दिया।

राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी समाजवादी पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि वह यूपी में एक स्थायी और निर्णायक राजनीतिक ताकत है, जो सिर्फ अपने पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है।

2024 में ऐतिहासिक उछाल और वोट शेयर में इजाफा

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा ने महज 5 सीटें जीती थीं। इसके विपरीत, 2024 में पार्टी ने यूपी की 80 सीटों में से 37 सीटों पर कब्जा जमाया। यह सपा के इतिहास का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है (इससे पहले 2004 में पार्टी ने 35-36 सीटें जीती थीं)। इसी चुनाव में राज्य में सत्तासीन बीजेपी 62 से घटकर 33 सीटों पर आ गई, जबकि इंडिया गठबंधन (सपा+कांग्रेस) ने कुल 43 सीटें हासिल कीं।

यह प्रदर्शन केवल सीटों तक सीमित नहीं था। 2019 में सपा का वोट शेयर लगभग 18 प्रतिशत था, जो 2024 में छलांग लगाकर 33.5 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का वोट शेयर 32 प्रतिशत के आसपास था, जो इस बात का स्पष्ट संकेत था कि सपा का जनाधार लगातार मजबूत हो रहा था।

PDA फॉर्मूला: टिकट बंटवारे में क्रांतिकारी बदलाव

2024 में सपा की सफलता का मुख्य कारण अखिलेश यादव की “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति रही। पार्टी ने अपने पारंपरिक एम-वाई (मुस्लिम-यादव) वोटबैंक से आगे बढ़कर एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार किया।

इस रणनीति का सबसे ठोस पहलू टिकट वितरण में देखने को मिला:

  • यादव उम्मीदवार सीमित किए: सपा ने सिर्फ 5 यादव उम्मीदवार मैदान में उतारे और वे सभी यादव परिवार के सदस्य थे।

  • गैर-यादव पिछड़ों पर फोकस: करीब 27 टिकट गैर-यादव ओबीसी जातियों (कुर्मी, मौर्य, निषाद, राजभर आदि) को दिए गए।

  • दलितों की भागीदारी: 15-16 टिकट दलित उम्मीदवारों को दिए गए। फैजाबाद जैसी सामान्य सीट से दलित चेहरे (अवधेश प्रसाद) को उतारना एक बड़ा राजनीतिक संदेश था।

  • मुस्लिम प्रतिनिधित्व: मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या केवल 4 तक सीमित रखी गई, फिर भी समुदाय का वोट एकजुट रहा।

नतीजतन, सवर्ण और गैर-यादव ओबीसी के भाजपाई गठजोड़ में बड़ी सेंध लगी। साथ ही, बसपा के कमजोर होने से दलित वोट का एक बड़ा हिस्सा सपा की तरफ शिफ्ट हुआ।

गठबंधन की ताकत और मुद्दों की गूंज

सीटों के इस गणित में कांग्रेस के साथ गठबंधन ने उत्प्रेरक का काम किया। जहां कांग्रेस चुनाव लड़ी, वहां सपा का वोट आसानी से ट्रांसफर हुआ, जिससे वोटों का बंटवारा रुक गया।

इसके साथ ही, सपा ने जमीनी मुद्दों को धारदार तरीके से उठाया। बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और “संविधान और आरक्षण खत्म होने के खतरे” जैसे मुद्दों ने दलित-पिछड़े मतदाताओं को गोलबंद करने में अहम भूमिका निभाई। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद यह अखिलेश यादव के नेतृत्व और संगठनात्मक पकड़ की पहली बड़ी परीक्षा थी, जिसमें वे सफल रहे।

2024 के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि यूपी में क्षेत्रीय दल जल्दी खत्म नहीं होते। विधानसभा में 100 से अधिक विधायकों के साथ सपा 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए मुख्य दावेदार बनी हुई है।