मणिपुर में सत्ता की राह आसान नहीं! हिंसा, विस्थापन के सवालों में उलझा गणित

अक्टूबर 2026 में मणिपुर की राजनीति केवल राजनीतिक दलों की लोकप्रियता या सामान्य चुनावी गणनाओं तक सीमित नहीं रह गई है। मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा, हजारों लोगों के विस्थापन और नाजुक कानून-व्यवस्था ने राज्य को गहरी दरारों में बांट दिया है।
राज्य में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने वाले हैं, जिसके लिए लगभग 19.60 लाख मतदाताओं की सूची तैयार हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आज मणिपुर में विधानसभा चुनाव हो जाएं, तो राज्य की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी?
वर्तमान राजनीतिक तस्वीर (2022 से अब तक)
2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बहुमत हासिल कर एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। लेकिन 2023 की हिंसा के बाद राज्य के हालात बेकाबू होते गए। फरवरी 2025 में बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।
फरवरी 2026 में राष्ट्रपति शासन हटाकर भाजपा ने युमनाम खेमचंद सिंह (मैतेई समुदाय) को नया मुख्यमंत्री बनाया। जातीय संतुलन साधने के लिए कुकी और नागा समुदाय से दो उपमुख्यमंत्री भी बनाए गए। हालांकि, इस व्यवस्था के बावजूद राज्य में जमीनी शांति अभी भी दूर है और कई क्षेत्रों में ‘अफस्पा’ (AFSPA) की मियाद बढ़ाई गई है।
जनभावना और जातीय ध्रुवीकरण
मणिपुर के लिए राज्य स्तर पर विस्तृत ओपिनियन पोल बहुत सीमित हैं। लोकसभा स्तर के कुछ सर्वे भाजपा की कुछ रिकवरी का संकेत जरूर देते हैं, लेकिन राज्य में पूरी तरह से जातीय ध्रुवीकरण हावी है।
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घाटी क्षेत्र (मैतेई बहुल): इन इलाकों में भाजपा की पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है।
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पहाड़ी क्षेत्र (कुकी-जो और नागा): इन क्षेत्रों में सरकार के प्रति गहरी नाराजगी और अलगाव की भावना साफ नजर आती है।
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विपक्ष: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संगठनात्मक रूप से कमजोर दिख रहे हैं, जिसका सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिल रहा है।
संभावित नतीजे: यदि आज हों चुनाव
अगर आज मतदान होता है, तो सबसे संभावित तस्वीर कुछ इस तरह हो सकती है:
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भाजपा को बढ़त: वर्तमान सत्ता और केंद्र सरकार के समर्थन का फायदा भाजपा को मिलेगा। वह सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है और एनपीपी (NPP) या एनपीएफ (NPF) जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में रह सकती है।
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जातीय आधार पर वोटिंग: घाटी और पहाड़ के बीच का विभाजन नतीजों को गहराई से प्रभावित करेगा। वोटिंग पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित होगी।
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त्रिशंकु विधानसभा की संभावना: कई सीटों पर स्थानीय और सामुदायिक समीकरण हावी रहने के कारण राज्य में बहुत बिखरे हुए जनादेश या त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ी चुनौती: शांतिपूर्ण चुनाव
मणिपुर के सामने असली सवाल यह नहीं है कि कौन सी पार्टी ज्यादा सीटें जीतेगी, बल्कि यह है कि क्या राज्य में इतनी सामान्य स्थिति लौट पाएगी कि चुनाव भयमुक्त माहौल में हो सकें?
जब तक विस्थापितों की सुरक्षित वापसी नहीं होती, हथियारों की वसूली नहीं होती और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली नहीं होती, तब तक कोई भी सरकार स्थायी रूप से काम नहीं कर सकती। पूर्व सीएम एन. बीरेन सिंह समेत कई नेता यह मान चुके हैं कि समस्या जटिल है और राजनीतिक समाधान के बिना सिर्फ सत्ता परिवर्तन से शांति नहीं आएगी।
आज के हालात में भाजपा सरकार बनाने की सबसे मजबूत दावेदार दिख रही है। हालांकि, यह बढ़त पार्टी की सामान्य लोकप्रियता से ज्यादा वर्तमान सत्ता समीकरण और विपक्ष की कमजोरी पर टिकी है। मणिपुर को इस वक्त एक स्थिर सरकार से ज्यादा स्थायी शांति की दरकार है। 2027 के चुनाव के असली मायने तभी होंगे जब राज्य से हिंसा का साया छंटेगा और लोग बिना डरे अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।

