4543 चयनित अभ्यर्थियों को राहत, यूपी पुलिस SI भर्ती में हाईकोर्ट से हरी झंडी

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड (UP PRPB) द्वारा आयोजित नागरिक पुलिस उप-निरीक्षक (SI) और समकक्ष पदों की सीधी भर्ती 2025 को लेकर एक बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने इस भर्ती की ‘फाइनल आंसर-की’ और अंतिम चयन परिणाम को चुनौती देने वाली सभी 22 रिट याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है।
जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की सिंगल बेंच ने याची श्याम सुंदर और अन्य 116 याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्ति पत्रों के वितरण पर पूर्व में लगाई गई अंतरिम रोक भी निष्प्रभावी हो गई है, जिससे चयनित 4543 अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा मामला 12 अगस्त 2025 को जारी विज्ञापन से जुड़ा हुआ है। यूपी पुलिस भर्ती बोर्ड ने नागरिक पुलिस में एसआई (SI) और समकक्ष पदों के कुल 4,543 पदों पर आवेदन मांगे थे। 14 और 15 मार्च 2026 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई। इसके बाद 23 मार्च 2026 को अस्थाई ‘उत्तर कुंजी’ (Provisional Answer Key) जारी कर अभ्यर्थियों से आपत्तियां मांगी गईं।
अभ्यर्थियों की आपत्तियों के बाद बोर्ड ने 32 प्रश्नों की पहचान कर उन्हें 13 अप्रैल 2026 को विषय विशेषज्ञों की समिति को भेजा। विशेषज्ञों के गहन परीक्षण के बाद 7 मई 2026 को फाइनल आंसर-की और उसी दिन लिखित परीक्षा का परिणाम भी घोषित कर दिया गया।
शारीरिक दक्षता और सभी चरणों के पूरा होने के बाद 14 जुलाई 2026 को अंतिम परिणाम जारी हुआ। इस परिणाम में जो अभ्यर्थी असफल रहे या लिखित परीक्षा ही पास नहीं कर सके, उन्होंने फाइनल आंसर-की और अंतिम परिणाम की वैधता पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं की क्या दलीलें थीं?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और प्रभाकर अवस्थी ने अदालत में पक्ष रखा। याचियों का मुख्य तर्क यह था कि विषय विशेषज्ञों की राय के बाद बोर्ड ने कई प्रश्नों के उत्तर बदल दिए, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ। उनका यह भी कहना था कि फाइनल आंसर-की जारी होने के बाद उन्हें अपनी बात रखने या नई आपत्ति दर्ज करने का कोई मौका नहीं दिया गया।
वहीं, राज्य सरकार और बोर्ड की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने पैरवी करते हुए बताया कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों के तहत विषय विशेषज्ञों की राय लेकर पूर्ण पारदर्शिता के साथ की गई है।
सुनवाई में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचियों के अधिवक्ताओं से सीधा सवाल किया कि क्या बोर्ड ने फाइनल आंसर-की तैयार करने में कोई दुर्भावना, पक्षपात या अनुचित साधन अपनाया था? इस पर याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता बोर्ड की कार्यप्रणाली में किसी तरह के पूर्वाग्रह या दुर्भावना का कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सके।
कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘यह एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन जाएगा’
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विषय विशेषज्ञों की राय लेकर तय की गई आंसर-की में किसी प्रकार की अवैधता या मनमाना रवैया नहीं पाया गया है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “विभिन्न विशेषज्ञों के बीच किसी प्रश्न के उत्तर को लेकर मतभेद होना स्वाभाविक है। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था का यह वैधानिक अधिकार है कि वह विशेषज्ञों की राय पर सही उत्तर तय करे।”
कोर्ट ने आगे कहा, “फाइनल आंसर-की जारी होने के बाद दोबारा आपत्तियां मांगने की मांग पूरी तरह से आधारहीन है। यदि ऐसा करने की अनुमति दी गई, तो यह एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन जाएगा और किसी भी भर्ती परीक्षा का परिणाम कभी अंतिम रूप नहीं ले सकेगा।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ लगभग पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए सभी रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। इससे पहले 30 सितंबर को कोर्ट ने नियुक्ति पत्र जारी करने पर अंतरिम रोक लगाई थी, जो अब हट गई है।

