चिप्स, AI और क्वांटम : ग्लोबल टेक पावर बनने के लिए भारत का 5-पॉइंट प्लान

भारत को एक ग्लोबल टेक्नोलॉजी पावरहाउस बनाने के लिए सरकार ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में अरबों डॉलर के निवेश का ब्लूप्रिंट तैयार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक चिप असेंबली और टेस्टिंग फैसिलिटी के उद्घाटन समारोह में स्पष्ट रूप से कहा था कि “यह दशक भारत का ‘टेकेड’ (Techade – Technology+Decade) है।”
हालांकि, अमेरिका, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे स्थापित प्रतिद्वंद्वियों की बराबरी करने के लिए भारत को अभी लंबा सफर तय करना है। आइए समझते हैं कि टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत के ‘मेगा पुश’ से जुड़ी 5 सबसे अहम बातें क्या हैं।
1. सेमीकंडक्टर्स (Chips): ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता’
2017 से 2025 तक भारत ने करीब 150 अरब डॉलर कीमत के माइक्रोचिप्स का आयात किया है। स्मार्टफोन से लेकर आधुनिक हथियारों तक में इस्तेमाल होने वाले इन चिप्स के लिए विदेशों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने 20 अरब डॉलर से अधिक की सहायता का संकल्प लिया है।
वर्तमान में अमेरिकी दिग्गज कंपनी माइक्रोन (Micron), भारतीय कंपनियां केयन्स, CDIL, सूची सेमीकॉन और CG सेमी (भारत, जापान व थाईलैंड का संयुक्त उद्यम) के पांच असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग प्लांट व्यावसायिक उत्पादन कर रहे हैं। इसके अलावा 7 अन्य प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है, जिनमें टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का गुजरात स्थित प्लांट भी शामिल है, जो ताइवान की PSMC के साथ मिलकर बन रहा है। सरकार के अनुमान के मुताबिक, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2026 में 50 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 110 अरब डॉलर और 2035 तक 200 अरब डॉलर के पार पहुंच जाएगा।
2. इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भारी उछाल आया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 में जो उत्पादन लगभग 31 अरब डॉलर था, वह 2024-25 में बढ़कर 133 अरब डॉलर हो गया है। चीन पर निर्भरता कम करने (China Plus One Strategy) के तहत Apple और Samsung जैसी ग्लोबल कंपनियों ने भारत में अपना उत्पादन बढ़ाया है। सरकार अब स्थानीय कंपोनेंट निर्माताओं को प्रोत्साहन (Incentives) देकर घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत कर रही है।
3. डेटा सेंटर्स (Data Centres) का विस्तार
डिजिटल डेटा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे है, लेकिन वैश्विक डेटा-सेंटर क्षमता का केवल 3% ही भारत के पास है। डिजिटल इंडिया फाउंडेशन के प्रमुख अरविंद गुप्ता के अनुसार, भारत इस क्षेत्र में एक मजबूत विकल्प बन सकता है।
सरकार का कहना है कि करीब 70 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं और 90 अरब डॉलर की घोषणा की जा चुकी है। इसमें रिलायंस, अदाणी, अमेजन (Amazon), माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसे दिग्गज निवेशक शामिल हैं। विशाखापत्तनम को एक प्रमुख केंद्र बनाया जा रहा है, जहां Google 15 अरब डॉलर का AI हब तैयार कर रहा है।
4. टैलेंट की ‘सोने की खदान’ और AI नौकरियां
सरकार का दावा है कि वैश्विक चिप-डिजाइन वर्कफोर्स का लगभग 20% हिस्सा भारत के पास है। प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, पिछले चार वर्षों में 70,000 डिजाइन इंजीनियरों को ट्रेनिंग दी गई है और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सेमीकंडक्टर कोर्स बढ़ाए गए हैं। पीएम मोदी ने भी भारतीय टैलेंट पूल को ‘सोने की खदान’ बताया है।
जापानी निवेश बैंक नोमुरा (Nomura) के अनुसार, एआई (AI) के कारण एशिया में नौकरियों के स्वरूप में सबसे बड़ा बदलाव भारत में देखने को मिलेगा। हालांकि एआई से नौकरियों के जाने की चिंताएं भी हैं, लेकिन सरकार को उम्मीद है कि 2027 तक AI से जुड़ी नौकरियां लगभग दोगुनी होकर 12.5 लाख हो जाएंगी।
5. चुनौतियां और भविष्य की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इन महत्वाकांक्षी योजनाओं को हकीकत में बदलने के लिए भारत को कड़े वैश्विक इकोसिस्टम का सामना करना होगा। अरविंद गुप्ता के मुताबिक, भारत के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं:
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ग्लोबल कैपिटल (वैश्विक पूंजी) तक पहुंच बनाना।
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दुनिया भर से बेहतरीन टैलेंट को आकर्षित करना और उन्हें देश में रोके रखना।
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तकनीक की बुनियाद माने जाने वाले हार्डवेयर संसाधनों की सुचारू सोर्सिंग करना।

