सलीम शेरवानी की राज्यसभा एंट्री: सैफई दरबार में पुराने घाव पर बैंड-एड

SAPA
ASHISH SHARMA RISHI
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उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी-कभी पुराने चेहरे अचानक नई चमक के साथ लौट आते हैं। बदायूं के दिग्गज सलीम इकबाल शेरवानी का नाम इन दिनों फिर गूंज रहा है। खबर यह है कि समाजवादी पार्टी उन्हें राज्यसभा भेजने पर विचार कर रही है। पांच बार सांसद रहे शेरवानी। राजीव गांधी के खास।

गुजराल सरकार में स्वास्थ्य और विदेश राज्यमंत्री। बदायूं में जिनका एक समय सिक्का चलता था। फिर 2009 आया। मुलायम सिंह यादव ने टिकट काट दिया और धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतार दिया। नाराज शेरवानी कांग्रेस के टिकट पर लड़े, तीसरे नंबर पर रहे। उसके बाद बदायूं सैफई परिवार की जागीर बनता चला गया। धर्मेंद्र जीते, हारे, फिर आदित्य यादव जीते। शेरवानी धीरे-धीरे तस्वीर से बाहर हो गए।अब अखिलेश यादव उन्हें राज्यसभा का टिकट थमाने की सोच रहे हैं। सवाल यही है—क्या यह पुराने जख्म पर मरहम है या सिर्फ एक सुविधाजनक सियासी प्रयोग?परिवार की राजनीति का अपना गणितसैफई दरबार में टिकट कटने का दर्द नई बात नहीं। जो एक दिन तक परिवार के करीब रहते हैं, अगले दिन समीकरण बदलते ही बाहर हो जाते हैं। शेरवानी उसी पुरानी परंपरा के जीवित उदाहरण हैं। 2009 में जो फैसला हुआ था, उसने सिर्फ एक नेता को नहीं, पूरे इलाके के समीकरण को बदल दिया। अब जब राज्यसभा की सीटों का गणित बिठाया जा रहा है तो वही चेहरा फिर उपयोगी लगने लगा है। राज्यसभा का टिकट लोकसभा जैसा नहीं होता। यहां जनता से सीधे नहीं उलझना पड़ता। विधायकों के वोट से काम चल जाता है। यानी पुराने घाव को बिना ज्यादा जोखिम के थोड़ा सा भरने का मौका। शेरवानी को सम्मान मिल जाए, पार्टी को एक अनुभवी चेहरा मिल जाए, और बदायूं वाले पुराने समर्थक भी थोड़ा नरम पड़ जाएं—तीन काम एक साथ।क्या है असल दांव?अखिलेश यादव की राजनीति में भावनाओं से ज्यादा सुविधा काम करती है। शेरवानी को वापस बुलाना अगर सिर्फ पुरानी गलती सुधारने के लिए होता तो शायद लोकसभा टिकट या कोई संगठनात्मक पद भी सोचा जाता। राज्यसभा का ख्याल इसलिए आ रहा है क्योंकि यहां जोखिम कम और प्रतीकात्मक लाभ ज्यादा है। यह भी हो सकता है कि मुस्लिम समीकरण और पुराने कांग्रेसी-सपा गठजोड़ के दिनों की याद ताजा करनी हो। शेरवानी दोनों दुनियाओं के आदमी रहे हैं। कांग्रेस से शुरू किया, सपा में लंबे समय तक रहे, फिर वापस कांग्रेस गए। अब फिर सपा के दरवाजे पर दस्तक की चर्चा है। राजनीति में ऐसी वापसी को “घर वापसी” कहते हैं। हालांकि घर का मालिक पहले खुद निकाल चुका हो तो वापसी का मजा थोड़ा अलग ही होता है।व्यंग्य की बात यहीं खत्मउत्तर प्रदेश की सियासत में पुराने नेताओं को राज्यसभा भेजने की परंपरा नई नहीं। जब मैदान में उपयोगिता खत्म हो जाती है तो ऊपरी सदन एक आरामदायक इंतजारगाह बन जाता है। शेरवानी के साथ भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है। सैफई परिवार ने एक बार उन्हें किनारे किया था। अब अगर राज्यसभा का टिकट मिला तो कहा जाएगा कि अखिलेश ने बड़ा दिल दिखाया। नहीं मिला तो कहा जाएगा कि पार्टी ने सिर्फ अटकलों का मजा लिया। दोनों सूरतों में शेरवानी की पुरानी शिकायत इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगी।राजनीति में घाव कभी पूरी तरह भरते नहीं। बस कभी-कभी उन पर बैंड-एड लगा दिया जाता है। राज्यसभा का टिकट अगर मिला तो वह बैंड-एड ही होगा। सुंदर, साफ और अस्थायी।