150 सीटों पर कांग्रेस का दावा क्यों? सपा से किन 5 जिलों में फंसा पेंच?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का विवाद गहराता जा रहा है। गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस के नेताओं की तरफ से लगातार आक्रामक दावे किए जा रहे हैं। कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) से बातचीत में साफ कहा कि पार्टी गठबंधन में किसी भी सूरत में 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी कर रही है और बातचीत के दौरान केवल कुछ ही सीटों पर समझौता संभव है।
इससे पहले सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी गठबंधन के समीकरणों पर कड़ा बयान दिया था। मसूद ने कहा कि बिना राहुल गांधी के नेतृत्व के अखिलेश यादव या उनकी पार्टी भाजपा का मुकाबला नहीं कर पाएगी और ऐसी स्थिति में 2027 में 2022 से अलग नतीजे नहीं आएंगे।
राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, दोनों दलों के बीच मुख्य टकराव पांच प्रमुख जिलों—सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी और सीतापुर की विधानसभा सीटों को लेकर बना हुआ है।
सहारनपुर: 7 में से 5 सीटों पर कांग्रेस का दावा
सीटों को लेकर सबसे तीखी खींचतान सहारनपुर जिले में दिखाई दे रही है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद जिले की सात विधानसभा सीटों में से पांच सीटें कांग्रेस के खाते में चाहते हैं।
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वर्तमान में सहारनपुर की बेहट और सहारनपुर देहात सीटों पर समाजवादी पार्टी के विधायक हैं।
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कांग्रेस स्थानीय सामाजिक और चुनावी समीकरणों का हवाला देकर इन दोनों सीटों पर अपनी दावेदारी जता रही है।
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दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी का रुख स्पष्ट है कि वह अपनी जीती हुई सीटें किसी भी सहयोगी के लिए नहीं छोड़ेगी।
रायबरेली और अमेठी में प्रतिष्ठा की लड़ाई
गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी जिले दोनों दलों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय बने हुए हैं। रायबरेली में 6 और अमेठी में 4 विधानसभा सीटें हैं।
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2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने अमेठी की दो सीटों (अमेठी सदर और गौरीगंज) पर जीत दर्ज की थी। वहीं, रायबरेली की चार सीटों (ऊंचाहार, हरचंदपुर, सरेनी और बछरावां) पर सपा के उम्मीदवार जीते थे।
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हालांकि बाद में ऊंचाहार के विधायक डॉ. मनोज कुमार पांडेय और गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह ने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की और भाजपा का रुख किया। इसके बावजूद सपा 2027 में इन सीटों पर खुद लड़ने की रणनीति पर कायम है।
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कांग्रेस इन क्षेत्रों को अपना पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र मानकर अधिकांश सीटों की मांग कर रही है। दूसरी ओर, अखिलेश यादव द्वारा अपनी ‘पीडीए रथ यात्रा’ की शुरुआत रायबरेली से करने के बाद इस क्षेत्र में सपा की दावेदारी और मजबूत मानी जा रही है।
बाराबंकी और सीतापुर में भी दोनों दलों के अपने दावे
बाराबंकी जिले में कांग्रेस सांसद तनुज पूनिया का संसदीय क्षेत्र होने के आधार पर पार्टी कम से कम तीन विधानसभा सीटों की मांग कर रही है। इसके उलट, सपा का दावा है कि जिले की सभी छह विधानसभा सीटों पर उसका कैडर और तैयारी पूरी है।
सीतापुर जिले में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। यहां से कांग्रेस सांसद राकेश राठौर पहले ही कुछ सीटों पर संभावित दावेदारों के नाम आगे बढ़ा चुके हैं। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस यहां 4 से 5 सीटें मांग रही है, जबकि सपा 1 या 2 से ज्यादा सीटें छोड़ने के पक्ष में नहीं दिख रही है।
334 सीटों का फॉर्मूला: कांग्रेस को ज्यादा सीटें क्यों नहीं देना चाहती सपा?
समाजवादी पार्टी की झिझक के पीछे 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े हैं। 2022 में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी के नेतृत्व में अलग चुनाव लड़ा था और पार्टी केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं, सपा ने सहयोगियों के साथ 347 सीटों पर चुनाव लड़कर 111 सीटें जीती थीं और 223 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे।
इनमें से लगभग 50 सीटें ऐसी थीं, जहां सपा उम्मीदवार 5,000 से भी कम वोटों के अंतर से हारे थे। इस आधार पर सपा 334 सीटों पर अपनी मजबूत जमीन का दावा कर रही है। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि केवल 69 ऐसी सीटें बचती हैं जहां पार्टी पहले या दूसरे स्थान पर नहीं थी, जिन्हें सहयोगियों के लिए आसानी से छोड़ा जा सकता है। सपा खेमे का तर्क है कि राज्य में कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा इतना मजबूत नहीं है कि उसके लिए मजबूत सीटें कुर्बान की जाएं।
सीटों की संभावित संख्या और पुराने अनुभव
फिलहाल औपचारिक चर्चाओं में जहां कांग्रेस सार्वजनिक तौर पर 150+ सीटों की बात कर रही है, वहीं अंदरूनी स्तर पर पार्टी की मांग 105 से 115 सीटों के आसपास आंकी जा रही है। इसके विपरीत, सपा 85 से 90 सीटों तक ही कांग्रेस को सीमित रखना चाहती है।
2017 के चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 100 से अधिक सीटें दी थीं, लेकिन नतीजा गठबंधन के पक्ष में नहीं रहा था। चर्चा यह भी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह सपा यह शर्त भी रख सकती है कि जहां कांग्रेस के पास मजबूत उम्मीदवार नहीं होंगे, वहां सपा के नेताओं को ही कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा जाए।

