5 सीटें, 22 में सपा का दबदबा, अंबेडकर नगर में बदल रहा सियासी गणित?

साल 1995 में अस्तित्व में आया अंबेडकर नगर जिला अपने नाम में ही सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रतीक रहा है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शुरुआती गढ़ों में शुमार रहे इस जिले की सियासत ने समय के साथ कई अहम करवटें ली हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की सभी 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) ने एकतरफा परचम लहराया था, लेकिन 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले जिले का सियासी तापमान एक बार फिर बढ़ गया है।
कटेहरी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हालिया जीत ने यह साफ कर दिया है कि 2027 का मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प होने जा रहा है। आइए जानते हैं अंबेडकर नगर जिले की सभी पांचों सीटों का चुनावी इतिहास, सामाजिक ढांचा और जमीनी समीकरण।
सामाजिक ताना-बाना और आबादी का गणित
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, अंबेडकर नगर जिले की कुल आबादी करीब 24 लाख है (पुरुष करीब 12.12 लाख और महिलाएं लगभग 11.85 लाख)।
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लिंगानुपात और साक्षरता: जिले में प्रति हजार पुरुषों पर 976 महिलाएं हैं, जो उत्तर प्रदेश के औसत लिंगानुपात से काफी बेहतर है। साक्षरता दर 74 प्रतिशत (पुरुष 82% और महिला 63%) है।
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ग्रामीण आबादी: जिले की लगभग 90 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, जिससे यहां ग्रामीण मुद्दे और स्थानीय जातीय समीकरण सीधे तौर पर प्रभावी रहते हैं।
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धार्मिक व जातीय संरचना: जिले में करीब 80 प्रतिशत हिंदू और 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। मुस्लिम मतदाता मुख्य रूप से टांडा, जलालपुर और अकबरपुर जैसे शहरी व कस्बाई इलाकों में केंद्रित हैं।
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दलित मतों की ताकत: जिले में अनुसूचित जाति (दलित) की आबादी करीब 25 प्रतिशत है, जो प्रदेश के औसत से कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि यहां की राजनीति में दलित मतदाता हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहते हैं।
5 विधानसभा सीटें: अलापुर सुरक्षित, बाकी चार सामान्य
अंबेडकर नगर जिले में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं: कटेहरी, टांडा, जलालपुर, अकबरपुर और अलापुर (सुरक्षित)।
2022 के विधानसभा चुनाव में यहां सपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए पांचों सीटों पर क्लीन स्वीप किया था। भाजपा और बसपा का यहां खाता तक नहीं खुल सका था:
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कटेहरी: सपा के दिग्गज नेता लाल जी वर्मा ने भाजपा की सहयोगी निषाद पार्टी के प्रत्याशी अवधेश द्विवेदी को पराजित किया था।
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टांडा: सपा के राम मूर्ति वर्मा ने भाजपा के कपिलदेव वर्मा को मात दी। इस सीट पर जिले में सबसे अधिक मतदान दर्ज हुआ था।
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जलालपुर: सपा के राकेश पांडेय ने बसपा प्रत्याशी डॉ. राजेश सिंह को 13,630 वोटों से हराया।
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अकबरपुर: सपा के रामअचल राजभर ने भाजपा के धर्मराज निषाद को 12,336 मतों के अंतर से शिकस्त दी।
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अलापुर (सुरक्षित): सपा के त्रिभुवन दत्त ने भाजपा प्रत्याशी त्रिवेणी राम को 9,383 वोटों से हराया था।
बसपा-भाजपा से सपा तक का सफर: नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ का असर
2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे 2022 से एकदम उलट थे। 2017 में भाजपा ने टांडा और अलापुर सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि बसपा ने कटेहरी और अकबरपुर पर कब्जा जमाया था। जलालपुर सीट सपा के खाते में गई थी।
गौरतलब है कि 2017 में बसपा के सिंबल पर जीते लाल जी वर्मा और रामअचल राजभर ने 2022 से ठीक पहले सपा का दामन थामा और दोनों अपनी-अपनी सीटों से दोबारा विधायक बने। इस घटनाक्रम ने यह साबित किया कि अंबेडकर नगर की राजनीति में पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा कद्दावर नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ और प्रभाव काम करता है।
कटेहरी उपचुनाव का झटका और 2027 की बिसात
2027 के चुनाव से पहले जिले की राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर कटेहरी सीट पर देखने को मिला। 2024 के लोकसभा चुनाव में लाल जी वर्मा अंबेडकर नगर से सांसद निर्वाचित हुए, जिसके बाद कटेहरी विधानसभा सीट खाली हो गई।
नवंबर 2024 में हुए उपचुनाव में सपा ने लाल जी वर्मा की पत्नी शोभावती वर्मा को प्रत्याशी बनाया, लेकिन भाजपा के धर्मराज निषाद ने बड़ी जीत हासिल कर यह सीट सपा से छीन ली। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह नतीजा सपा के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ, क्योंकि कटेहरी में कुर्मी, निषाद और ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा प्रभाव है और भाजपा निषाद समुदाय को लामबंद करने में सफल रही।
इस उपचुनाव के नतीजे ने साफ कर दिया है कि भाजपा 2027 में जिले में पूरी ताकत से वापसी करने की कोशिश में है। वहीं, सपा के सामने अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को बचाए रखने की चुनौती है। दूसरी तरफ, बसपा भी अपने पुराने सियासी गढ़ में कैडर को दोबारा सक्रिय कर दलित वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है।
पांचों विधानसभा सीटों का जातीय समीकरण
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कटेहरी: कुर्मी, निषाद और ब्राह्मण मतदाता यहां निर्णायक भूमिका में हैं। यही कारण है कि प्रमुख पार्टियां यहां हमेशा मजबूत पिछड़े वर्ग के चेहरे पर दांव लगाती हैं।
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टांडा: मुस्लिम आबादी की बड़ी हिस्सेदारी है। साथ ही यादव और अन्य अति-पिछड़ी जातियां भी हार-जीत तय करने में अहम रोल निभाती हैं।
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जलालपुर: मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं का आपसी संतुलन और ध्रुवीकरण इस सीट का चुनावी परिणाम तय करता है।
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अकबरपुर: राजभर और अन्य पिछड़ी जातियों का व्यापक प्रभाव है, जबकि मुस्लिम वोटर भी यहां निर्णायक साबित होते हैं।
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अलापुर (सुरक्षित): अनुसूचित जाति (दलित) सबसे बड़ा वोट बैंक है। इसके साथ ही यादव और मुस्लिम मतदाताओं का गठजोड़ यहां चुनावी नतीजों पर गहरा असर डालता है।

