तेल पाइपलाइन पर ड्रोन अटैक! क्रूड $108 पार, भारत पर क्या पड़ेगा असर?

मध्य पूर्व में जारी तनाव अब केवल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तक सीमित नहीं रह गया है। सऊदी अरब की 1,200 किलोमीटर लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन’ पर हुए ड्रोन हमले के बाद इसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। होर्मुज मार्ग के दबाव में होने के कारण यह पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए जीवनरेखा बन गई थी। इसके ठप होने से न सिर्फ वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई चेन खतरे में आ गई है, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार की संरचनात्मक कमजोरी भी उजागर हो गई है।
यानबू पोर्ट पर महज 5-7 दिन का स्टॉक
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूर्वी सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों से लाल सागर पर स्थित यानबू (Yanbu) पोर्ट तक कच्चा तेल पहुंचाती है। हाल के महीनों में इस पाइपलाइन के जरिए रोजाना 40 से 50 लाख बैरल तेल सप्लाई हो रहा था, जो वैश्विक सप्लाई का करीब 4-5 प्रतिशत है। फिलहाल यानबू पोर्ट के पास महज 5 से 7 दिन का क्रूड स्टॉक बचा है। मिस्र के बंदरगाहों पर रखे अतिरिक्त भंडार से फौरी तौर पर कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन मरम्मत में देरी होने पर सऊदी अरब का निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा। सऊदी अरब का तेल उत्पादन अगस्त में पहले ही घटकर करीब 62 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर आ गया था। इसके ऊपर लाल सागर और बाब अल-मंदेब में हूती विद्रोहियों के खतरे ने स्थिति को और जटिल कर दिया है।
ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर के करीब, बाजार में हड़कंप
पाइपलाइन बंद होने की खबर से ऊर्जा बाजार में तेज प्रतिक्रिया दिखी है। 14 सितंबर को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 107-108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गईं। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) भी 100 डॉलर के ऊपर बना हुआ है। बाजार विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह उछाल सिर्फ एक पाइपलाइन बंद होने का नतीजा नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर खड़े हुए गंभीर सवालों का परिणाम है।
वैश्विक व्यापार के ‘चोकपॉइंट्स’ पर खतरा
इस हमले ने साफ कर दिया है कि दुनिया भर का तेल व्यापार अब भी कुछ गिने-चुने संकरे जलमार्गों और पाइपलाइनों पर अत्यधिक निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब अल-मंदेब और अब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन—ये तीनों अहम सप्लाई रूट एक साथ उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में आ गए हैं। इस संकट के बाद कई देश अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की नीतियों पर तेजी से विचार कर सकते हैं।
भारत की महंगाई और आयात बिल पर सीधा दबाव
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के ऊपर बनी रहने से देश का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। इसके परिणामस्वरूप परिवहन लागत और घरेलू महंगाई (Inflation) में इजाफा हो सकता है। मौजूदा स्थिति सरकार के लिए सब्सिडी और कर समायोजन जैसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का दबाव बनाएगी। यह भारत के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) का विस्तार करने और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश तेज करने का भी एक संकेत है।
बाजार की नजरें अब पाइपलाइन की मरम्मत के काम और मध्य पूर्व में बन रहे नए क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर टिकी हुई हैं।
