सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख, पाकिस्तान की बढ़ी बेचैनी

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अजमल शाह
अजमल शाह

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर भारत के कड़े रुख और कूटनीतिक फैसलों के बीच पाकिस्तान के सामने गंभीर रणनीतिक और भौगोलिक संकट खड़ा हो गया है। तुर्की के जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट येवगेनिया मिखाइलिद और इंटरनेशनल लॉ की वकील खदीजा अलमुस खानम के हालिया लेखों के मुताबिक, अप्रैल 2025 से पाकिस्तान के सिंधु जल आयुक्त द्वारा भेजे गए पत्रों का भारत की तरफ से कोई जवाब न मिलना इस्लामाबाद की बढ़ती बेचैनी को साफ तौर पर दर्शाता है।

ग्लेशियर पिघलने से बढ़ा जल संकट का खतरा

माउंटेन रिसर्च सेंटर (ICIMOD) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 2000 के बाद से ग्लेशियरों के खत्म होने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। सिंधु नदी के बहाव का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बर्फ पिघलने से आता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बदलाव के चलते आने वाले समय में पाकिस्तान के आधे हिस्से में भीषण सूखा और आधे हिस्से में बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं का सामना करने की आशंका बढ़ गई है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सीमा-पार आतंकवाद पर लगाम नहीं लगती, तब तक इस संधि को बहाल करने पर विचार नहीं किया जाएगा।

कानूनी गतिरोध और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तनातनी

भारत द्वारा 2025 से इस संधि को स्थगित रखने और परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) की मध्यस्थता प्रक्रिया के बहिष्कार से मामला और उलझ गया है। पाकिस्तान का तर्क है कि कोई भी पक्ष अकेले इस संधि को निलंबित नहीं कर सकता, जबकि भारत का यह सख्त संदेश साफ है कि आतंकवाद और पानी का प्रवाह एक साथ नहीं चल सकते। क्षेत्रीय जल सुरक्षा और बदलती भौगोलिक परिस्थितियों के बीच यह विवाद अब मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।