UN में Mercator Map पर वोटिंग, अफ्रीका क्यों चाहता है नया नक्शा?

संयुक्त राष्ट्र (UN) महासभा में शुक्रवार को एक बेहद खास और ऐतिहासिक प्रस्ताव पर वोटिंग होने जा रही है, जो दुनिया को देखने का हमारा नजरिया हमेशा के लिए बदल सकती है। अफ्रीकी देश टोगो ने अफ्रीकी संघ के 54 सदस्य देशों के समर्थन से एक प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें दुनिया भर में इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक ‘मर्केटर नक्शे’ (Mercator Map) की जगह एक ऐसा नया नक्शा अपनाने की मांग की गई है, जो अफ्रीका और ग्लोबल साउथ का बिल्कुल सही और वास्तविक आकार दर्शाता हो।
क्या है मर्केटर नक्शे में खामी और ग्रीनलैंड का भ्रम?
वर्तमान में हम जिस नक्शे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उसे 1569 में फ्लेमिश नक्शानवीस जेरार्डस मर्केटर ने नाविकों को समुद्र में रास्ता दिखाने के लिए बनाया था।
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आकार का भ्रम: इस नक्शे की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें भूमध्य रेखा (Equator) के पास के इलाके अपने असली आकार से बहुत छोटे दिखते हैं, जबकि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास के देश जरूरत से ज्यादा बड़े नजर आते हैं।
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अफ्रीका बनाम ग्रीनलैंड: मर्केटर नक्शे में अफ्रीका महाद्वीप और डेनमार्क के अधीन आने वाला ग्रीनलैंड लगभग एक ही आकार के दिखाई देते हैं। जबकि हकीकत में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा बड़ा है।
‘कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म’: पश्चिमी देशों की उपनिवेशवादी सोच का आरोप
भूगोलविदों और इतिहासकारों का मानना है कि मर्केटर नक्शा पश्चिमी देशों की उपनिवेशवादी सोच (Cartographic Colonialism) को बढ़ावा देता है।
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ग्लोबल साउथ को छोटा दिखाना: इस नक्शे ने दुनिया के देशों की ताकत देखने के नजरिए को प्रभावित किया है। इसमें उत्तरी गोलार्ध के देशों (ग्लोबल नॉर्थ) को विशाल, जबकि ग्लोबल साउथ (अफ्रीका, एशिया और विकासशील देश) को भौगोलिक रूप से बहुत छोटा दिखाया जाता है।
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अफ्रीका की असली विशालता: असल में अफ्रीका इतना विशाल है कि इसके भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप का एक बड़ा हिस्सा समा सकता है, फिर भी जगह बच जाएगी।
#CorrectTheMap मुहिम और आगे का असर
Change.org पर चल रहे ‘#CorrectTheMap’ कैंपेन के जरिए नक्शे में इस असमानता को सुधारने की मांग तेज हो गई है, जिसे अफ्रीकी संघ ने अगस्त 2025 में अपना समर्थन दिया था।
भले ही संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव को लागू करना कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है, लेकिन अगर यह महासभा में पास हो जाता है, तो इसका एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक असर होगा। इसके पारित होने से दुनियाभर के स्कूलों की किताबों, शिक्षा प्रणाली, रोजमर्रा की तकनीक और सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होने वाले नक्शों को बदलने का रास्ता साफ हो सकता है।
