Eid-e-Milad-un-Nabi: 26 अगस्त को मनाया जाएगा, जानें इतिहास और महत्व

ईद-ए-मिलाद-उन-नबी इस साल 26 अगस्त को मनाया जाएगा। इसे मौलिद या मौलिद-अन-नबी-अश-शरीफ भी कहा जाता है। इस्लामी परंपरा में यह अवसर पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की याद से जुड़ा है। यह इस्लामी चंद्र कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल में आता है।
इस दिन मुस्लिम समुदाय पैगंबर मुहम्मद के जीवन, उनकी शिक्षाओं और उनके बताए आदर्शों को याद करता है। अलग-अलग देशों और समुदायों में इसे मनाने की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी क्यों मनाई जाती है?
इस्लामी परंपरा के अनुसार ईद-ए-मिलाद-उन-नबी पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की याद में मनाई जाती है। उन्हें इस्लाम का अंतिम पैगंबर माना जाता है। उनके संदेशों में एकेश्वरवाद, दया, न्याय, भाईचारे और इंसानियत जैसे मूल्यों पर जोर दिया गया।
इस अवसर पर मुस्लिम समुदाय उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करता है। कई जगहों पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और पैगंबर की सीरत पर चर्चा होती है।
भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, रूस और जर्मनी समेत कई देशों में भी अलग-अलग परंपराओं के साथ यह अवसर मनाया जाता है।
सुन्नी और शिया समुदाय में तारीख अलग
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी की तारीख को लेकर मुस्लिम समुदायों में अंतर मिलता है।
- सुन्नी समुदाय: आमतौर पर 12 रबी-उल-अव्वल को मिलाद मनाता है।
- शिया समुदाय: आमतौर पर 17 रबी-उल-अव्वल को इसे मनाता है।
इसलिए मिलाद की तारीख और आयोजन की परंपरा समुदाय तथा स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
ईद-ए-मिलाद का इतिहास
इतिहास से जुड़े विवरणों के अनुसार पैगंबर मुहम्मद का जन्म लगभग 570 ईस्वी में मक्का में हुआ था।
ईद-ए-मिलाद को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंपरा के शुरुआती उदाहरण फातिमी शासनकाल से जोड़े जाते हैं। बाद के दौर में यह परंपरा कई मुस्लिम क्षेत्रों तक पहुंची और अलग-अलग जगहों पर इसके आयोजन के अपने तरीके विकसित हुए।
भारत में कई शहरों में इस मौके पर मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों की ओर से सीरत कार्यक्रम, तकरीर और सामुदायिक आयोजन किए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में जुलूस और सजावट भी देखने को मिलती है, जबकि कई समुदाय इसे मुख्य रूप से धार्मिक सभाओं और इबादत के रूप में मनाते हैं।
ईद-ए-मिलाद पर क्या किया जाता है?
इस अवसर पर अलग-अलग जगहों पर धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- मस्जिदों में विशेष नमाज और दुआ
- कुरआन की तिलावत
- पैगंबर मुहम्मद की सीरत पर तकरीर और धार्मिक सभाएं
- जुलूस और धार्मिक कार्यक्रम
- गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन या दान
- साफ या नए कपड़े पहनकर इबादत
- सामुदायिक स्तर पर धार्मिक और सामाजिक आयोजन
