शिवलिंग की पूजा सबसे पहले किसने की? पुराणों में मिलती हैं 2 अलग कथाएं

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साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

भगवान शिव की आराधना के लिए सावन का महीना विशेष माना जाता है। इस दौरान शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ रहती है और शिवलिंग का अभिषेक व पूजन किया जाता है। लेकिन शिवलिंग की पूजा की शुरुआत कैसे हुई और सबसे पहले इसकी पूजा किसने की थी? इस सवाल को लेकर अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं।

लिंग पुराण में शिवलिंग पूजा की शुरुआत से जुड़ी एक कथा मिलती है, जिसमें ब्रह्मा के शिवलिंग बनाकर पूजा करने का उल्लेख है। वहीं शिव पुराण में ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद तथा अनंत अग्निपुंज के रूप में शिव के प्राकट्य की कथा आती है। दोनों कथाओं में शिवलिंग को भगवान शिव के स्वरूप से जोड़ा गया है।

लिंग पुराण में शिवलिंग पूजा की शुरुआत की कथा

लिंग पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव को भाग नहीं दिया गया था। इससे दुखी होकर माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए। सती के देह त्याग की खबर मिलने पर भगवान शिव क्रोधित हुए और दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया।

इसके बाद सती के वियोग में शिव विचरण करने लगे। कथा के अनुसार, एक बस्ती में पहुंचने पर वहां की स्त्रियां भगवान शिव के रूप से प्रभावित हो गईं। यह देखकर वहां मौजूद ऋषियों ने शिव को शाप दे दिया। शाप के प्रभाव से शिव का लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा और इससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।

देवता और ऋषि इस स्थिति से चिंतित होकर ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने पूरी घटना जानने के बाद देवताओं और ऋषियों के साथ भगवान शिव की शरण ली। कथा में ब्रह्मा द्वारा शिव से अपना लिंग पुनः धारण करने की प्रार्थना किए जाने का वर्णन है।

भगवान शिव ने इसके बाद एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि यदि सभी लोग उनके लिंग की पूजा शुरू करेंगे तो वह उसे पुनः धारण कर लेंगे। इसके बाद ब्रह्मा ने स्वर्ण का शिवलिंग बनाकर उसका विधि-विधान से पूजन किया। देवताओं और ऋषियों ने भी शिवलिंग की पूजा की। लिंग पुराण की इस कथा में इसी घटना को शिवलिंग पूजन की शुरुआत से जोड़ा गया है।

शिव पुराण में क्या है शिवलिंग की उत्पत्ति की कथा?

शिव पुराण में शिवलिंग के प्राकट्य से जुड़ी एक अलग कथा मिलती है। इसमें ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद का वर्णन है। विवाद बढ़ने पर दोनों के बीच अग्नि की ज्वालाओं से घिरा एक विशाल अग्निपुंज प्रकट हुआ।

आकाशवाणी हुई कि जो इस अग्निपुंज के आदि और अंत का पता लगा लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु ने उसके आरंभ और अंत को जानने का प्रयास किया। “ब्रह्मा और विष्णु ने उस अग्निपुंज का आदि-अंत खोजने की कोशिश की, लेकिन काफी प्रयास के बाद भी उसकी सीमा नहीं मिल सकी।”

जब दोनों वापस लौटे तो उन्हें ओम की ध्वनि सुनाई दी और परब्रह्म स्वरूप में भगवान शिव के प्रकट होने की कथा आती है। शिव ने अग्निपुंज के रहस्य को स्पष्ट किया। ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शिव की स्तुति की।

इसके बाद उनकी प्रार्थना पर वही अग्निपुंज लिंग स्वरूप में परिवर्तित हुआ। ब्रह्मा और विष्णु ने उस लिंग की पूजा की। शिव पुराण की इस कथा में शिवलिंग को भगवान शिव के अनंत स्वरूप और प्राकट्य से जोड़ा गया है।

शिवलिंग की पूजा से जुड़े धार्मिक विश्वास

धार्मिक मान्यताओं में शिवलिंग की पूजा को विशेष फलदायी माना गया है। लिंग पुराण में शिवलिंग की पूजा से संतान, धन-धान्य, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति जैसे धार्मिक फलों का उल्लेख मिलता है।

एक मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह स्थान तीर्थ के समान पवित्र माना जाता है। तीर्थ की मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा करने और अलग-अलग सामग्री से शिवलिंग निर्माण की परंपरा का भी पुराणों में उल्लेख मिलता है।

भगवान शिव के नाम का जाप भी शिव उपासना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि ‘शिव’ नाम का स्मरण व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से पवित्र करता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था और पुराणों में वर्णित कथाओं के संदर्भ में समझा जाता है। इनके फल और प्रभाव को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं और विश्वास प्रचलित हैं।