शिव को क्यों प्रिय है सावन? जानिए वो 3 पौराणिक कथाएं जिनसे जुड़ी ये मान्यता

हिंदू पंचांग में 12 महीने माने गए हैं और धार्मिक परंपराओं में हर महीने का अपना महत्व बताया गया है। इन्हीं में श्रावण मास यानी सावन का महीना भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। सावन में शिव मंदिरों में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना की परंपरा है।
लेकिन भगवान शिव को सावन ही इतना प्रिय क्यों माना जाता है? इस सवाल के जवाब में धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में कई कथाएं मिलती हैं। इनमें माता पार्वती की तपस्या, भगवान शिव का ससुराल जाना और मारकंडेय की तपस्या से जुड़ी कथाएं प्रमुख हैं।
स्कंद पुराण में श्रावण मास की महिमा
स्कंद पुराण के श्रावणमास माहात्म्य में श्रावण को भगवान शिव का प्रिय मास बताते हुए कहा गया है:
“द्वादशस्वपि मासेषु श्रावणो मेऽतिवल्लभः।
तत्रैव सर्वथा पूजा कार्या श्रावणमासके॥”
इसका भावार्थ है कि बारहों महीनों में श्रावण भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इस महीने उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इसी धार्मिक मान्यता के कारण सावन में भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक और व्रत का विशेष महत्व माना जाता है।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी कथा
श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय मानने के पीछे एक प्रमुख पौराणिक कथा माता पार्वती से जुड़ी है। कथा के अनुसार, देवी सती ने अपने पिता के यहां भगवान शिव के अपमान से दुखी होकर योगशक्ति के माध्यम से देह त्याग दी थी। इससे पहले उन्होंने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया था।
इसके बाद देवी सती ने दूसरे जन्म में राजा हिमाचल और रानी मैना के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया। धार्मिक कथा के अनुसार, युवावस्था में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की।
मान्यता है कि यह तपस्या सावन के महीने में की गई थी। पार्वती के कठोर संकल्प और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और दोनों का विवाह हुआ। इसी कथा के आधार पर श्रावण मास को भगवान शिव और माता पार्वती के संबंध से भी जोड़ा जाता है।
सावन में ससुराल आते हैं भगवान शिव?
श्रावण मास से जुड़ी एक अन्य लोक मान्यता भगवान शिव के ससुराल जाने की है। इस कथा के अनुसार, सावन के महीने में भगवान शिव धरती पर अवतरित होकर अपने ससुराल पहुंचे थे।
वहां उनका स्वागत अर्घ्य देकर और जलाभिषेक करके किया गया। इसी मान्यता के आधार पर कहा जाता है कि भगवान शिव हर साल सावन में अपने ससुराल आते हैं।
यह कथा धार्मिक लोक परंपरा में प्रचलित है और अलग-अलग क्षेत्रों में इससे जुड़ी मान्यताओं और पूजा-पद्धतियों में अंतर भी देखने को मिलता है।
मारकंडेय की तपस्या की कथा
भगवान शिव और सावन से जुड़ी एक अन्य लोक कथा ऋषि मृकंडु के पुत्र मारकंडेय से संबंधित है।
कथा के अनुसार, मारकंडेय ने लंबी आयु की कामना से सावन के महीने में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें कृपा प्रदान की।
कथा के अनुसार, जब मारकंडेय की आयु पूरी हुई तो भगवान शिव ने उन्हें मृत्यु के बंधन से बचाया। इसी कारण मार्कंडेय को शिवभक्ति और दीर्घायु से जुड़ी कथाओं में विशेष स्थान मिलता है।
सावन में शिव पूजा का विशेष महत्व
इन्हीं धार्मिक मान्यताओं और कथाओं के कारण सावन में भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक और व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इन कथाओं के स्वरूप में अंतर मिलता है।
