मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे में क्यों उतारे जाते हैं जूते? जानें सभी धर्मों के नियम

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राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

भारत में मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में प्रवेश करने से पहले जूते-चप्पल बाहर उतारना एक आम दृश्य है। आमतौर पर इसे सिर्फ साफ-सफाई से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से हर आस्था के केंद्र में जूते उतारने के मायने और नियम अलग-अलग हैं। हिंदू, मुस्लिम और सिख परंपराओं में यह प्रथा जहां गहराई से जुड़ी है, वहीं ईसाई चर्चों में इसको लेकर व्यवस्था बिल्कुल भिन्न है।

हिंदू मंदिर: पवित्रता और बाहरी दुनिया को छोड़ने का प्रतीक

हिंदू धर्म में मंदिर को केवल एक इमारत नहीं, बल्कि देवता का पवित्र निवास स्थान माना जाता है। यहां जूते उतारने का सबसे सीधा कारण ‘शुचिता’ (पवित्रता) है। मंदिर के फर्श पर भक्त नंगे पैर चलते हैं, बैठते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं, इसलिए सड़क की गंदगी को अंदर जाने से रोका जाता है। वैचारिक रूप से, जूते उतारना अपने बाहरी जीवन, दुनियादारी और अहंकार को देवस्थान की सीमा के बाहर छोड़ने का प्रतीक है।

अक्सर यह दावा किया जाता है कि मनुस्मृति में मंदिर में जूते पहनकर जाने की मनाही है। हालांकि, मूल पाठ (4.66 और 4.130) में दूसरों के इस्तेमाल किए जूते न पहनने और देव प्रतिमाओं की छाया पर पैर न रखने का जिक्र है, लेकिन ‘मंदिर में जूते उतारने’ का कोई सीधा आदेश नहीं मिलता। दिलचस्प बात यह है कि हिंदू परंपरा में जूते को बाहरी वस्तु माना गया है, जबकि गुरु या भगवान की ‘पादुका’ स्वयं श्रद्धा और पूजा का विषय बन जाती है।

मस्जिद: कालीन की स्वच्छता और नमाज की मर्यादा

मस्जिद के भीतर जूते उतारने का नियम केवल ‘पवित्र जगह में जूता न ले जाने’ की धारणा पर आधारित नहीं है। सहीह हदीस के प्रसंगों के अनुसार, इस्लाम में साफ जूतों के साथ नमाज पढ़ने की अनुमति है। एक प्रसंग के मुताबिक, पैगंबर मुहम्मद ने नमाज के दौरान अपनी सैंडल उतारी थी क्योंकि उसमें गंदगी लगी थी। उन्होंने निर्देश दिया था कि यदि फुटवियर साफ है, तो उसमें नमाज पढ़ी जा सकती है।

वर्तमान में अधिकांश मस्जिदों के प्रेयर हॉल (Prayer Hall) में कालीन बिछे होते हैं। मिस्र की संस्था ‘दार अल-इफ्ता’ के अनुसार, नमाज की जगह को साफ रखने और दूसरे नमाजियों को असुविधा से बचाने के लिए आधुनिक मस्जिदों में जूते बाहर उतारने की व्यवस्था अपनाई गई है।

गुरुद्वारा: समानता और ‘सिख रहत मर्यादा’ का पालन

सिख परंपरा में जूते उतारने को लेकर नियम पूरी तरह स्पष्ट और अनिवार्य हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की ‘सिख रहत मर्यादा’ में साफ निर्देश है कि गुरुद्वारे में प्रवेश करते समय व्यक्ति अपने जूते उतारे और पैर साफ करे।

गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब को आध्यात्मिक गुरु का दर्जा प्राप्त है, और जूते उतारना उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का अहम हिस्सा है। गुरुद्वारे में सभी धर्मों और समुदायों के लोग एक समान रूप से प्रवेश करते हैं। बाहर जूते छोड़ने का एक संदेश यह भी है कि व्यक्ति अपनी बाहरी सामाजिक पहचान और रुतबे को पीछे छोड़कर संगत के सामने समानता के भाव से भीतर आ रहा है।

चर्च: कोई सार्वभौमिक नियम नहीं, लेकिन बाइबिल में है जिक्र

मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे के विपरीत ईसाई चर्चों में जूते उतारना कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। रोमन कैथोलिक ‘मास’ (Mass) और अधिकांश ऑर्थोडॉक्स चर्चों की व्यवस्था में श्रद्धालुओं के लिए फॉर्मल जूते पहनकर आना सामान्य माना जाता है।

हालांकि, ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल (बुक ऑफ एक्सोडस) में एक बेहद महत्वपूर्ण घटना का जिक्र है। जब मूसा (Moses) होरेब पर्वत पर जलती हुई झाड़ी के पास पहुंचे, तो ईश्वर ने उनसे कहा था— “अपने पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि जिस स्थान पर तुम खड़े हो वह पवित्र भूमि है।” यह प्रसंग पवित्र उपस्थिति के सामने विनम्रता को दर्शाता है, लेकिन इसे आधुनिक चर्चों के लिए सामान्य नियम नहीं बनाया गया है।

धार्मिक स्थलों के दरवाजे पर जूता उतारना केवल आधुनिक हाइजीन (Hygiene) का हिस्सा नहीं है। यह पवित्र और सामान्य संसार के बीच एक ऐसी सीमा बनाता है, जहां इंसान अपनी हैसियत और बाहरी दुनिया को छोड़कर, कुछ क्षणों के लिए एक साधारण मनुष्य के रूप में जमीन पर खड़ा होता है।