इजरायल चुनाव में अरब दलों पर रोक क्यों लगी और अब सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा

Benjamin-Netanyahu
अजमल शाह
अजमल शाह

इस्राइल में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले देश की राजनीति में बड़ा मोड़ आ गया है। इस्राइल की केंद्रीय चुनाव समिति ने प्रमुख अरब राजनीतिक दलों और गठबंधनों को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। इस फैसले की जद में मुख्य अरब गठबंधन ‘जॉइंट लिस्ट’ और मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली ‘राअम’ (यूनाइटेड अरब लिस्ट) शामिल हैं। इसके अलावा कुछ प्रमुख अरब नेताओं पर व्यक्तिगत प्रतिबंध भी लगाए गए हैं।

समिति के इस कदम ने देश में एक नया राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस्राइल की कुल आबादी का करीब 21 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 20 लाख लोग) अरब नागरिकों का है, जिनमें बहुसंख्यक मुस्लिम हैं। इन दलों पर प्रतिबंध का सीधा असर संसद (नेसेट) में इस बड़े अल्पसंख्यक वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ना तय माना जा रहा है।

लिकुड और दक्षिणपंथी दलों की याचिका पर कार्रवाई

बैन की यह कार्रवाई प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और अन्य दक्षिणपंथी दलों द्वारा दायर याचिकाओं के आधार पर की गई है।

दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि ये दल इस्राइल राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करते हैं। इसके समर्थन में एक लेख का भी हवाला दिया गया, जिसमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए हमलों को एक “ऐतिहासिक घटना” बताया गया था।

दूसरी तरफ, अरब नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि वे हिंसा का पूरी तरह विरोध करते हैं और केवल अपने नागरिकों के लोकतांत्रिक व नागरिक अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस्राइल की संसद में क्या है अरब दलों की भूमिका?

इस्राइल में अरब नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों का प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से दो धाराओं में बंटा है:

  • जॉइंट लिस्ट: यह विभिन्न विचारधाराओं वाले धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और राष्ट्रवादी अरब दलों का एक साझा मोर्चा है।

  • राअम (Ra’am): मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यह पार्टी व्यावहारिक राजनीति के लिए जानी जाती है। साल 2021-22 में नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड के कार्यकाल के दौरान राअम इस्राइल के इतिहास में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बनने वाली पहली अरब पार्टी बनी थी।

ये पार्टियां मुख्य रूप से अरब बस्तियों और शहरों के लिए बजट आवंटन, बुनियादी ढांचे के विकास, रोजगार और समान अधिकारों की मांग संसद में उठाती रही हैं। वहीं दक्षिणपंथी खेमा इन पर इस्राइल के यहूदी और लोकतांत्रिक चरित्र को नकारने का आरोप लगाता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के पाले में गेंद, अटॉर्नी जनरल ने उठाए सवाल

केंद्रीय चुनाव समिति द्वारा लिया गया यह फैसला अंतिम नहीं है। इस्राइली चुनावी कानून के मुताबिक, चुनाव समिति के ऐसे किसी भी अयोग्यता आदेश की समीक्षा देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाती है।

मामले में अटॉर्नी जनरल ने भी अपनी राय रखते हुए कहा है कि ज्यादातर प्रतिबंधों के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद नहीं हैं। इतिहास गवाह है कि अतीत में भी चुनाव समिति द्वारा अरब दलों पर लगाए गए कई प्रतिबंधों को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक मानते हुए खारिज कर दिया था।

चुनावी नतीजों और सत्ता के गणित पर असर

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले से ही 27 अक्टूबर के चुनावों की पूरी दिशा तय होगी:

  • प्रतिबंध हटने की स्थिति: यदि सुप्रीम कोर्ट चुनाव समिति के फैसले को पलट देता है, तो दोनों प्रमुख अरब दल चुनावी मैदान में होंगे। सर्वेक्षणों के अनुसार, ये दल 10 से 12 सीटें जीतने की स्थिति में हैं। इतनी सीटें नेतन्याहू विरोधी गुट को सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़े तक पहुंचने में मदद कर सकती हैं।

  • प्रतिबंध बरकरार रहने की स्थिति: यदि सुप्रीम कोर्ट इस फैसले को बरकरार रखता है, तो अरब वोटरों की भागीदारी गिर सकती है और संसद में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य हो जाएगा। इससे नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी गठबंधन को सीधा चुनावी लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

इस्राइली लोकतंत्र में सुरक्षा चिंताओं और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिक गई हैं।