दिल्ली में 47 लाख वोटर कहां गए? 24 अगस्त को खुलेगा बड़ा राज

दिल्ली की मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण ने राजधानी की चुनावी तस्वीर पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। करीब 1.45 करोड़ मौजूदा मतदाताओं में से 97.47 लाख ने गणना फॉर्म जमा किए हैं, जबकि लगभग 47 लाख मतदाताओं के फॉर्म अभी रिकॉर्ड में नहीं हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि 47 लाख लोगों का वोटर कार्ड खत्म हो गया या उनका नाम अंतिम सूची से निश्चित तौर पर हट जाएगा। असली फैसला 24 अगस्त को जारी होने वाली ड्राफ्ट मतदाता सूची और उसके बाद शुरू होने वाली दावा-आपत्ति प्रक्रिया में होगा।
47 लाख नामों पर क्यों उठे सवाल
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में कुल मतदाताओं का करीब 67 प्रतिशत हिस्सा गणना फॉर्म जमा कर चुका है। बाकी मतदाताओं के फॉर्म जमा न होने या उनके डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया पूरी न होने के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इसलिए फिलहाल 47 लाख का आंकड़ा ड्राफ्ट सूची से बाहर रहने की संभावित संख्या है, इसे अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की संख्या कहना सही नहीं होगा।
यही इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण सिर्फ नाम जोड़ने या हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। इसका सीधा संबंध इस बात से है कि चुनाव के दिन कौन व्यक्ति अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा।
रोहिणी आगे, तुगलकाबाद पीछे
विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई देता है। रोहिणी में 1,50,398 मतदाताओं में से 1,25,478 गणना फॉर्म का डिजिटाइजेशन हो चुका है, जो करीब 83.43 प्रतिशत है। शकूरबस्ती में यह आंकड़ा 81.26 प्रतिशत, राजौरी गार्डन में 79.14 प्रतिशत, मंगोलपुरी में 78.76 प्रतिशत और उत्तम नगर में 77.76 प्रतिशत बताया गया है।
इसके उलट तुगलकाबाद में सिर्फ 52.15 प्रतिशत फॉर्म का डिजिटाइजेशन हुआ है। ओखला में 54.67 प्रतिशत, आरके पुरम में 55.54 प्रतिशत, कस्तूरबा नगर में 55.97 प्रतिशत और कालकाजी में 57.21 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आया है। यानी राजधानी के अलग-अलग इलाकों में पुनरीक्षण प्रक्रिया की प्रगति एक जैसी नहीं है।
मुस्लिम बहुल इलाकों की तस्वीर एक जैसी नहीं
राजनीतिक रूप से संवेदनशील पहलू यह है कि कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी फॉर्म जमा होने के आंकड़े अलग-अलग हैं। चांदनी चौक में करीब 61 प्रतिशत फॉर्म जमा होने की जानकारी दी गई है। लेकिन मुस्तफाबाद में यह आंकड़ा 71.91 प्रतिशत, मटिया महल में 75.5 प्रतिशत, सीलमपुर में 76.63 प्रतिशत और बाबरपुर में 73 प्रतिशत है। बल्लीमारान में 67.35 प्रतिशत फॉर्म दर्ज किए गए हैं।
इसलिए केवल किसी विधानसभा क्षेत्र की जनसांख्यिकी के आधार पर कम या ज्यादा डिजिटाइजेशन का कारण तय करना जल्दबाजी होगी। प्रशासनिक आंकड़े यह बताते हैं कि अंतर मौजूद है, लेकिन उसके कारणों का निष्कर्ष अलग से स्थापित तथ्यों और जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
जिलेवार आंकड़े भी बड़ा अंतर दिखाते हैं
जिलेवार तस्वीर देखें तो आउटर नॉर्थ में गणना फॉर्म के डिजिटाइजेशन का प्रतिशत सबसे अधिक 75.68 बताया गया है। पश्चिम में 73.29 और दक्षिण पश्चिम में 73.16 प्रतिशत फॉर्म दर्ज हुए हैं। दूसरी तरफ दक्षिण पूर्व जिले में यह आंकड़ा 56.32 प्रतिशत, नई दिल्ली में 60.76 प्रतिशत और साउथ में 61.32 प्रतिशत है।
इन आंकड़ों से साफ है कि प्रक्रिया की रफ्तार पूरे शहर में समान नहीं रही। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि कम डिजिटाइजेशन वाले जिले के सभी मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से हट जाएंगे। इसके लिए आगे की दावा-आपत्ति प्रक्रिया निर्णायक होगी।
नाम क्यों छूट सकता है?
निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक जिन मतदाताओं के फॉर्म रिकॉर्ड में नहीं आए हैं, उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में चिह्नित किया जा सकता है। इनमें अनुपस्थित, दूसरी जगह स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट मतदाता जैसी श्रेणियां शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार जिन फॉर्म का डिजिटाइजेशन नहीं हुआ है, उनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की बताई जा रही है जिन्हें स्थायी रूप से स्थानांतरित माना गया है।
लेकिन यहां भी एक अहम फर्क है। किसी मतदाता का फॉर्म समय पर जमा न होना और उसका मतदाता सूची से हमेशा के लिए बाहर हो जाना एक ही बात नहीं है। यही कारण है कि ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होने के बाद दावा और आपत्ति की व्यवस्था रखी गई है।
24 अगस्त से शुरू होगी असली परीक्षा
17 अगस्त को गणना फॉर्म जमा करने की समयसीमा खत्म हो गई। अब अगला बड़ा पड़ाव 24 अगस्त है, जब ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होनी है। जिन मतदाताओं का नाम इसमें नहीं होगा, उनके पास दावा और आपत्ति दाखिल करने का अवसर रहेगा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह प्रक्रिया 24 अगस्त से 23 सितंबर तक चलेगी।
इस अवधि में संबंधित मतदाता फॉर्म 6 के जरिए अपना नाम शामिल कराने का दावा कर सकते हैं। इसके बाद निर्वाचन अधिकारी दावों और आपत्तियों की जांच करेंगे। अधिकारियों के अनुसार इनके निपटारे की प्रक्रिया 24 अगस्त से 22 अक्टूबर के बीच चलेगी।
इसके बाद 27 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची जारी होने की तारीख निर्धारित है। यानी अभी सामने आया 47 लाख का आंकड़ा अंतिम सूची का आंकड़ा नहीं है। अगले दो महीनों में होने वाली जांच और दावा-आपत्ति प्रक्रिया इस संख्या को काफी बदल सकती है।
असली सवाल 47 लाख नहीं, 47 लाख की जांच है
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने नाम फिलहाल ड्राफ्ट सूची से बाहर हैं। सवाल यह है कि इन नामों की जांच कितनी पारदर्शी और कितनी प्रभावी तरीके से होती है। किसी मृत व्यक्ति, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता या डुप्लीकेट प्रविष्टि को हटाना मतदाता सूची को शुद्ध करने का सामान्य हिस्सा है। लेकिन यदि कोई वास्तविक और पात्र मतदाता प्रशासनिक प्रक्रिया में छूट गया है, तो दावा-आपत्ति की व्यवस्था उसके लिए सुरक्षा कवच होनी चाहिए।
यही वजह है कि 24 अगस्त से 23 सितंबर के बीच की अवधि बेहद महत्वपूर्ण होगी। जिन लोगों को ड्राफ्ट सूची में अपना नाम नहीं मिलता, उनके लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि अपने मताधिकार को सुरक्षित रखने का अवसर होगा।
चुनावी राजनीति से पहले प्रशासनिक चुनौती
दिल्ली की मतदाता सूची को लेकर आंकड़े सामने आने के बाद राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों से अकेले यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी खास समुदाय या इलाके के मतदाताओं को जानबूझकर सूची से बाहर किया जा रहा है। फिलहाल तथ्य इतना बताते हैं कि बड़ी संख्या में गणना फॉर्म रिकॉर्ड में नहीं हैं और निर्वाचन तंत्र अब ड्राफ्ट सूची, नोटिस तथा दावा-आपत्ति की प्रक्रिया के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है।
27 अक्टूबर की अंतिम सूची तक तस्वीर बदल सकती है। इसलिए इस समय 47 लाख को “कटे हुए वोटर” कहना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। असली कहानी अब शुरू होगी, जब 24 अगस्त को ड्राफ्ट सूची सामने आएगी और लाखों मतदाताओं को यह देखना होगा कि उनका नाम उसमें है या नहीं।
