JSSC CGL रद्द होते ही छिन गई नौकरी? रोते युवाओं ने पूछा- हमारा क्या कसूर

JSSC CGL
राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर शुरू हुआ विवाद अब उन युवाओं के लिए नई मुसीबत बन गया है, जिन्होंने परीक्षा पास करने के बाद सरकारी नौकरी हासिल कर ली थी। JSSC CGL 2024 के करीब 2,000 चयनित अभ्यर्थियों के सामने अब नौकरी जाने का संकट खड़ा हो गया है। परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के खिलाफ ये अभ्यर्थी रांची में प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी दलील सीधी है, अगर परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई हो, लेकिन जिन उम्मीदवारों ने अपनी मेहनत से परीक्षा पास की और नियुक्ति पाई, उन्हें क्यों सजा मिले?

एक फैसले से उलट गई जिंदगी

प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहे चयनित अभ्यर्थियों के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने का मामला नहीं है। इनमें ऐसे युवा भी हैं, जिन्हें चयन के बाद सरकारी नौकरी मिली और जिन्होंने अपने भविष्य की योजनाएं उसी नियुक्ति के भरोसे बनानी शुरू कर दी थीं। अब परीक्षा रद्द होने के फैसले ने उनके सामने नौकरी और भविष्य दोनों को लेकर अनिश्चितता खड़ी कर दी है। प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने किसी अनियमितता में हिस्सा नहीं लिया और यदि परीक्षा में गड़बड़ी का संदेह है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

‘जांच कराइए, दोषी पर कार्रवाई कीजिए’

प्रदर्शन में शामिल एक अभ्यर्थी ने सरकार से जांच की मांग करते हुए कहा कि वह किसी भी जांच के लिए तैयार है। उसका कहना था कि सरकार चाहे तो CBI से जांच करा सकती है और अभ्यर्थी अपने सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने को तैयार हैं। भावुक होकर उसने कहा कि कुछ लोगों की गलती की कीमत सभी चयनित उम्मीदवारों से नहीं वसूली जानी चाहिए। उसके शब्दों में नौकरी छिनने का डर साफ दिखाई दिया, जब उसने कहा, “हम लोग मर जाएंगे।”

यह बयान सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस असुरक्षा को सामने लाता है जिसमें नियुक्ति पा चुके युवा खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। हालांकि परीक्षा में कथित अनियमितता और उसके लिए जिम्मेदार लोगों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

एक तरफ जश्न, दूसरी तरफ विरोध

रांची में परीक्षा रद्द कराने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों के लिए फैसला उनकी मांग की जीत है। लेकिन इसी फैसले ने चयनित अभ्यर्थियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। एक ही परीक्षा को लेकर दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने हैं। एक तरफ वे अभ्यर्थी हैं जो कथित गड़बड़ी की जांच और परीक्षा रद्द करने को जरूरी मान रहे हैं, दूसरी तरफ वे उम्मीदवार हैं जिन्होंने उसी परीक्षा को पास कर नौकरी हासिल की और अब खुद को फैसले का नुकसान उठाने वाला पक्ष मान रहे हैं।

यहीं से विवाद का सबसे कठिन सवाल पैदा होता है: अगर परीक्षा की पूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित होती है तो निष्पक्षता कैसे तय होगी और अगर सभी अभ्यर्थियों को दोषी नहीं माना गया है तो नियुक्त उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?

‘दोषी को पकड़िए, सबकी नौकरी मत छीनिए’

JSSC CGL पास करने वाले अभ्यर्थियों की मांग है कि परीक्षा में यदि किसी स्तर पर पेपर लीक, धांधली या दूसरी अनियमितता हुई है तो उसकी स्वतंत्र जांच हो और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी पूरे मामले की CBI जांच की मांग भी कर रहे हैं। उनका सवाल है कि यदि जांच से दोषियों की पहचान संभव है तो पूरी परीक्षा और उसके आधार पर हुई नियुक्तियों को एक साथ खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। परीक्षा में कथित अनियमितता का आरोप और प्रत्येक सफल अभ्यर्थी की व्यक्तिगत संलिप्तता एक ही बात नहीं है। किसी परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठना अपने आप में हर चयनित उम्मीदवार को दोषी साबित नहीं करता। लेकिन दूसरी ओर, यदि जांच में परीक्षा की निष्पक्षता ही गंभीर रूप से प्रभावित पाई जाती है, तो सरकार के सामने चयन प्रक्रिया की वैधता बनाए रखने की चुनौती भी होगी।

अब असली लड़ाई जांच की प्रक्रिया पर

इस पूरे विवाद में आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि सरकार और जांच एजेंसियां परीक्षा रद्द करने के आधारों को किस तरह स्थापित करती हैं और चयनित अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए क्या रास्ता अपनाया जाता है। परीक्षा में अनियमितता की जांच यदि होती है तो उसका दायरा, सबूत और जिम्मेदारी तय करना महत्वपूर्ण होगा। वहीं नियुक्त अभ्यर्थियों के लिए यह सवाल उतना ही अहम है कि जांच पूरी होने तक उनके रोजगार और भविष्य की स्थिति क्या होगी।

यही वह बिंदु है जहां आंदोलन सिर्फ परीक्षा का विवाद नहीं रह जाता। यह प्रतियोगी परीक्षा की विश्वसनीयता बनाम चयनित उम्मीदवारों के अधिकार का मामला बन जाता है। एक तरफ हजारों युवाओं की मेहनत और परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा है, दूसरी तरफ निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया बनाए रखने की सरकारी जिम्मेदारी।

युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल

सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला युवा वर्षों तक एक परीक्षा के लिए पढ़ता है। चयन के बाद नियुक्ति मिलती है तो वह मान लेता है कि उसकी मेहनत अब नौकरी में बदल चुकी है। ऐसे में परीक्षा रद्द होने का असर सिर्फ नियुक्ति पत्र पर नहीं पड़ता, बल्कि परिवार की आर्थिक योजना, करियर और भविष्य की पूरी दिशा प्रभावित हो सकती है।

JSSC CGL विवाद में अब सरकार के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है कि कथित अनियमितता पर कार्रवाई और निर्दोष चयनित उम्मीदवारों के अधिकार, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। दोषी बचना नहीं चाहिए, लेकिन अगर किसी अभ्यर्थी की कोई भूमिका नहीं थी तो उसके हिस्से में आई सजा का न्यायसंगत आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।

आखिरकार किसी भर्ती परीक्षा की असली परीक्षा सिर्फ प्रश्नपत्र और परिणाम के दिन नहीं होती। उसकी विश्वसनीयता तब साबित होती है जब विवाद सामने आने के बाद व्यवस्था यह भरोसा दिला सके कि नकल करने वाला पकड़ा जाएगा, गड़बड़ी करने वाला जवाब देगा और मेहनत से चयन पाने वाला युवा व्यवस्था के फैसलों में खुद को अनाथ नहीं पाएगा।