मोहन भागवत: ‘हिंदू राष्ट्र का मतलब मुस्लिमों को भगाना नहीं’

न्यूयॉर्क/टोरंटो: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों विदेश दौरे पर हैं। उन्होंने अमेरिका के न्यूयॉर्क और कनाडा के टोरंटो में आयोजित कार्यक्रमों को संबोधित करते हुए हिंदू पहचान, भारत की सभ्यतागत सोच और विविधता में एकता जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा और उसमें मुसलमानों के स्थान को लेकर भी एक अहम बयान दिया।
‘हिंदू राष्ट्र का मतलब मुस्लिमों को भगाना नहीं’
न्यूयॉर्क में अहेड फोरम (AHEAD Forum) द्वारा आयोजित फेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए भागवत ने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व सभी को साथ लेकर चलने का नाम है। उन्होंने एक वाकये का जिक्र करते हुए कहा, “एक बार बातचीत के दौरान मुस्लिमों ने मुझसे आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के विचार के बारे में पूछा था। उन्होंने सवाल किया कि क्या इसके मुताबिक मुस्लिमों को देश से भगा दिया जाएगा? मैंने जवाब दिया- नहीं, यह हिंदुत्व नहीं है। अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू ही नहीं रह जाता है।”
विविधता और हिंदू विचार की मूल भावना
मोहन भागवत ने हिंदू शब्द को किसी एक भाषा, पूजा पद्धति या जीवनशैली के दायरे से बाहर बताते हुए कहा कि हिंदू विचारधारा की मूल भावना विविधताओं को स्वीकार करने और उसमें एकता पहचानने की है। उन्होंने कहा, “दुनिया में कहीं भी अगर किसी पर अत्याचार हुआ है, तो उसे हमेशा भारत में शरण मिली है।”
भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता पर उन्होंने जोर देकर कहा, “कई जातियां हैं, कई पंथ हैं, कई भाषाएं हैं। सब कुछ अनेक है। विविधता स्वाभाविक है, जबकि एकता वास्तविकता है।”
भारत विश्वगुरु बना, महाशक्ति नहीं
आरएसएस प्रमुख ने भारत के वैश्विक प्रभाव की तुलना सैन्य या आर्थिक ताकत से करने के बजाय सेवा और मानवीय मूल्यों से की। उन्होंने कहा, “भारत ने दुनिया पर अपना प्रभाव किसी महाशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने चरित्र और सेवा भाव से बनाया। हमारे पूर्वजों ने मेक्सिको से साइबेरिया तक यात्रा की, लेकिन किसी देश पर विजय हासिल नहीं की। उन्होंने ज्ञान, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और सभ्यतागत मूल्यों का प्रसार किया।”
उन्होंने भारत की सेवा परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा जरूरतमंदों की मदद की है, कई बार तो बिना मांगे भी सहायता का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने श्रोताओं को याद दिलाया कि “अगर हिंदू जागता है तो दुनिया जागती है।”
‘करियर का मतलब सिर्फ पैसा नहीं’
युवाओं और भौतिक जीवन पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि यह मायने नहीं रखता कि हम कितना कमाते हैं, बल्कि यह मायने रखता है कि हम कितना बांटते हैं। चार पुरुषार्थों—अर्थ और काम—का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया को आगे बढ़ाने के लिए भौतिक सफलता भी जरूरी है, लेकिन करियर का मतलब सिर्फ पैसा या सुख-सुविधाएं नहीं होना चाहिए।
‘कर्मभूमि अमेरिका के प्रति निष्ठावान रहें’
अंत में प्रवासी भारतीयों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराते हुए मोहन भागवत ने कहा, “आप अमेरिका में हैं। आप अमेरिका में रहते हैं और यहीं कमाते हैं। इसलिए आप अमेरिकी हैं और आपको अमेरिका के प्रति सच्चा व्यवहार करना चाहिए।” उन्होंने प्रवासियों से अपील की कि वे अपनी कर्मभूमि (अमेरिका) के प्रति हमेशा निष्ठावान रहें।
