मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर क्या लिखा है? राहुल के दावे में कितनी सच्चाई

नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति से जुड़े प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि महिला बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में बेटों के अधिकार या नियंत्रण में रहती है। उनके बयान के बाद मनुस्मृति के उन श्लोकों की चर्चा फिर शुरू हो गई है, जिनमें महिलाओं की स्वतंत्रता और परिवार में उनकी स्थिति को लेकर प्रावधान मिलते हैं।
राहुल गांधी के बयान में जिस खास क्रम का उल्लेख है, वह मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 9.3 में मिलता है। इस श्लोक में पिता, पति और पुत्रों की ओर से महिला की रक्षा का क्रम बताया गया है और अंत में महिला के स्वतंत्र न होने की बात कही गई है।
मनुस्मृति क्या है?
मनुस्मृति प्राचीन संस्कृत धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में से एक है। इसे मानव धर्मशास्त्र या मनु के नियम के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सामाजिक आचरण, पारिवारिक कर्तव्यों, विवाह, उत्तराधिकार, दंड और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े कई विषयों पर नियम और निर्देश मिलते हैं।
ग्रंथ को पारंपरिक रूप से मनु से जोड़ा जाता है। इसके अलग-अलग संस्करणों और पांडुलिपियों में पाठ को लेकर अंतर भी मिलता है। महिलाओं, जाति, विवाह, संपत्ति और सामाजिक कर्तव्यों से जुड़े प्रावधानों के कारण मनुस्मृति लंबे समय से इतिहासकारों, विद्वानों और समाज सुधारकों के बीच चर्चा का विषय रही है।
श्लोक 9.3 में महिलाओं के बारे में क्या कहा गया है?
राहुल गांधी के बयान से सबसे सीधे तौर पर जुड़ा प्रावधान अध्याय 9 का श्लोक 9.3 है। मूल संस्कृत पाठ में कहा गया है:
“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
इसका सामान्य अर्थ है कि बचपन में पिता महिला की रक्षा करता है, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करते हैं। श्लोक के अंतिम हिस्से में महिला को स्वतंत्रता के योग्य न होने की बात कही गई है।
इसलिए अगर राहुल गांधी के बयान को सिर्फ इस खास दावे तक सीमित रखा जाए कि मनुस्मृति में महिला के जीवन के अलग-अलग चरणों में पिता, पति और पुत्र की भूमिका बताई गई है, तो उसका आधार श्लोक 9.3 में मौजूद है।
श्लोक 9.2 में भी स्वतंत्रता को लेकर प्रावधान
अध्याय 9 का इससे ठीक पहले वाला श्लोक 9.2 भी महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर स्पष्ट भाषा इस्तेमाल करता है। इसमें महिलाओं को अपने परिवार के पुरुषों के अधीन रखने की बात कही गई है। श्लोक में उन्हें दिन-रात स्वतंत्र न रखने और नियंत्रण में रखने की बात आती है।
इसलिए महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर मनुस्मृति में केवल एक अलग-थलग पंक्ति नहीं है। अध्याय 9 के शुरुआती श्लोकों में इस विषय पर लगातार प्रावधान मिलते हैं।
क्या मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान की बात भी है?
हां। मनुस्मृति के दूसरे हिस्सों में महिलाओं के सम्मान को लेकर अलग भाषा दिखाई देती है। अध्याय 3 के श्लोक 3.55 में पिता, भाई, पति और पति के भाइयों द्वारा महिलाओं का सम्मान और उनका श्रृंगार करने की बात कही गई है।
इसके बाद श्लोक 3.56 में कहा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां धार्मिक कर्म निष्फल माने जाते हैं।
श्लोक 3.57 में भी महिलाओं के दुखी होने वाले परिवार के विनाश और उनके सुखी रहने वाले परिवार की उन्नति की बात कही गई है।
यानी ग्रंथ में महिलाओं के सम्मान और उनकी स्वतंत्रता को लेकर एक जैसी भाषा नहीं मिलती। अलग-अलग अध्यायों और प्रसंगों में अलग तरह के नियम और सामाजिक भूमिकाएं सामने आती हैं।
तो राहुल गांधी का दावा कितना सही?
राहुल गांधी ने जिस विशेष बात का जिक्र किया है, उसका मूल आधार मनुस्मृति के श्लोक 9.3 में मिलता है। उसमें पिता, पति और पुत्रों की ओर से महिला की रक्षा तथा महिला के स्वतंत्र न होने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है।
इसलिए राहुल गांधी के बयान का मूल संदर्भ मनुस्मृति के श्लोक 9.3 में मौजूद है, लेकिन मनुस्मृति में महिलाओं से जुड़े सभी प्रावधानों को केवल इसी एक श्लोक के आधार पर परिभाषित करना सही नहीं होगा।
