हथियारों पर दुनिया करेगी भरोसा? रक्षा मंत्रालय का नया सर्टिफिकेट फॉर्मूला

brahmos
Lt Col Vijay Singh (डिफेंस एडिटर)
Lt Col Vijay Singh (डिफेंस एडिटर)

भारत में बने रक्षा उपकरण अब वैश्विक बाजार में मजबूती से अपनी जगह बना रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार ने 2029 तक इस आंकड़े को 50,000 करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। विदेशी खरीदारों का भरोसा जीतने और निर्यात की राह आसान बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने ‘फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज़’ (Fit for Indian Military Use) सर्टिफिकेट के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं।

विदेशी खरीदारों के मन का सबसे बड़ा सवाल

विदेशी बाजार में कोई भी हथियार या सैन्य उपकरण खरीदते समय ग्राहक देश का पहला सवाल होता है कि क्या इसे बनाने वाले देश की अपनी सेना ने इसका परीक्षण किया है। इसी सवाल का आधिकारिक जवाब डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस (DGQA) का यह सर्टिफिकेट है।

DGQA रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग के तहत काम करने वाला एक अंतर-सेवा संगठन है, जो तीनों सेनाओं को सप्लाई होने वाले हथियारों और उपकरणों की गुणवत्ता जांचता है। रक्षा निर्यात को रफ्तार देने के लिए DGQA अब उन कंपनियों को भी प्रमाणन दे रहा है, जिनके पास सीधे भारतीय सेनाओं का कोई सप्लाई ऑर्डर नहीं है। कोई भी कंपनी सिर्फ विदेशी बाजार के लिए उत्पाद बनाकर भी सरकारी जांच प्रक्रिया से गुजरकर यह मुहर हासिल कर सकती है।

2025 की नई SOP: तीन श्रेणियों में मिलेगा सर्टिफिकेट

रक्षा उत्पादन विभाग ने 12 सितंबर 2025 को सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया को अपडेट करते हुए नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। इसके तहत तीन तरह के सर्टिफिकेट तय किए गए हैं:

  • फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज: यह उन भारतीय कंपनियों को मिलता है, जिनका उत्पाद रक्षा खरीद प्रक्रिया, iDEX, TDF, ‘मेक’ श्रेणी या DRDO के तकनीकी ट्रायल में पास हो चुका है। इसके लिए कंपनी को अलग से आवेदन नहीं करना पड़ता। ट्रायल रिपोर्ट मिलने के 30 दिन के भीतर यह सर्टिफिकेट खुद जारी हो जाता है।

  • फिट ऐज पर वेंडर स्पेसिफिकेशन: इस श्रेणी में उत्पाद को कंपनी द्वारा तय की गई विशिष्टताओं या विदेशी ग्राहक की जरूरत के आधार पर परखा जाता है। विकास के बीच के चरण में मौजूद उत्पाद भी यह सर्टिफिकेट हासिल कर सकते हैं। इसका खर्च कंपनी को खुद उठाना होता है।

  • सर्टिफिकेट ऑफ फील्ड ट्रायल आउटकम: जब कंपनियां अपना उत्पाद सीधे सेना की किसी कमान या यूनिट के स्तर पर फील्ड ट्रायल के लिए पेश करती हैं, तो संबंधित फॉर्मेशन मुख्यालय का कोर कमांडर (या समकक्ष अधिकारी) ट्रायल के नतीजों के आधार पर यह सर्टिफिकेट जारी करता है।

स्टार्टअप्स और MSME के लिए गेमचेंजर

पूरी व्यवस्था में जमीनी प्रणालियों के लिए DGQA, हवाई प्रणालियों के लिए DGAQA और नौसैनिक प्रणालियों के लिए DGNAI को नोडल एजेंसी बनाया गया है। ये सर्टिफिकेट पांच साल तक मान्य रहते हैं।

रक्षा कारोबार पूरी तरह भरोसे पर टिका होता है। भारत सरकार के नाम से जारी यह सर्टिफिकेट स्पष्ट करता है कि उत्पाद सैन्य माहौल में काम करने लायक और टिकाऊ है। स्टार्टअप्स और MSME के लिए इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि उनके पास बड़ी कंपनियों जैसा लंबा व्यावसायिक ट्रैक रिकॉर्ड नहीं होता।

‘FF Bot’ बना नई व्यवस्था का ताजा उदाहरण

इस प्रमाणन प्रक्रिया का सबसे ताजा उदाहरण रिमोट से चलने वाला फायर-फाइटिंग रोबोट ‘FF Bot’ है। अहमदाबाद की स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने iDEX पहल के तहत पहले इसे नौसेना के लिए विकसित किया था। 2023 में विमानवाहक पोत INS विक्रांत पर इसके यूजर ट्रायल हुए थे।

इसी साल जनवरी में थलसेना ने 62 करोड़ रुपये में ऐसे 18 रोबोट खरीदने का करार किया है। इन रोबोट्स को गोला-बारूद डिपो और ईंधन भंडार जैसी अति-संवेदनशील जगहों के लिए खरीदा गया है। सैन्य ट्रायल पार करने के बाद अब इस स्वदेशी रोबोट को ‘फिट फॉर इंडियन मिलिट्री यूज़’ सर्टिफिकेट मिल चुका है, जिससे विदेशी बाजार में भी इसकी दावेदारी मजबूत हो गई है।