MP में हर घर नल का दावा कितना सच? 23 जिलों में 70% से कम कवरेज

heavy-rain-waterlogging-mokhana-culvert-relief
संजीव पॉल
संजीव पॉल

भोपाल: मध्यप्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत घर-घर नल पहुंचाने की तस्वीर सरकारी आंकड़ों में भले ही आगे बढ़ती दिख रही हो, लेकिन जमीन पर पानी की कहानी अब भी अधूरी है। राज्य के 55 में से 23 जिलों में पीने योग्य नल जल की उपलब्धता 70 प्रतिशत से भी कम आंकी गई है। यानी प्रदेश के करीब 42 फीसदी जिले ऐसे हैं, जहां हर 10 परिवार में से कम से कम 3 परिवार अभी घरेलू नल कनेक्शन के दायरे से बाहर हैं।

यह जानकारी केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने राज्यसभा में सांसद विवेक तन्खा के सवाल के जवाब में दी है। आंकड़ों के मुताबिक इन 23 जिलों में कुल 49,49,461 परिवार हैं, जिनमें से 29,55,970 परिवारों तक ही घरेलू नल कनेक्शन पहुंचा है। यानी 19,93,491 परिवार, करीब 20 लाख परिवार, अभी नल कनेक्शन से बाहर हैं।

लेकिन कहानी सिर्फ नल कनेक्शन तक सीमित नहीं है। किसी घर के बाहर नल लग जाना और उस नल से हर दिन पर्याप्त, नियमित और सुरक्षित पानी मिलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। मध्यप्रदेश के आंकड़े इसी अंतर की ओर इशारा करते हैं।

मैहर और सिंगरौली में सबसे कम कवरेज

70 फीसदी से कम नल जल कवरेज वाले जिलों में मैहर की स्थिति सबसे कमजोर बताई गई है। यहां 1,36,204 परिवारों में सिर्फ 54,757 परिवारों तक घरेलू नल कनेक्शन पहुंचा है। कवरेज 40.20 फीसदी है, जबकि 81,447 परिवार अभी इससे बाहर हैं।

सिंगरौली में 1,61,082 परिवारों में 65,431 परिवारों को कनेक्शन मिला है। यहां कवरेज 40.62 फीसदी है और 95,651 परिवार नल कनेक्शन से बाहर हैं।

छतरपुर में 2,47,475 परिवारों में 1,05,853 परिवारों को कनेक्शन मिला है। यहां 1,41,622 परिवार अभी बाहर हैं और कवरेज 42.77 फीसदी है।

सतना में 2,37,866 परिवारों में सिर्फ 1,03,097 परिवारों के पास घरेलू नल कनेक्शन है। यहां 1,34,769 परिवार कनेक्शन से बाहर हैं और कवरेज 43.34 फीसदी है।

वहीं शिवपुरी में संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। जिले में 3,20,873 परिवार हैं, लेकिन केवल 1,68,469 परिवारों के पास घरेलू नल कनेक्शन है। यानी 1,52,404 परिवार अभी इस सुविधा से बाहर हैं। यहां कवरेज 52.50 फीसदी है।

23 जिलों की तस्वीर क्या कहती है?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 70 फीसदी से कम कवरेज वाले जिलों में स्थिति इस तरह है:

  • जबलपुर: 69.67%
  • बड़वानी: 69.62%
  • डिंडोरी: 69.48%
  • टीकमगढ़: 69.13%
  • रतलाम: 67.47%
  • विदिशा: 66.67%
  • आगर मालवा: 65.38%
  • मंदसौर: 62.79%
  • शाजापुर: 59.40%
  • गुना: 58.56%
  • नीमच: 57.93%
  • सीहोर: 56.95%
  • रीवा: 53.65%
  • शिवपुरी: 52.50%
  • सीधी: 52.36%
  • मझगवां: 49.86%
  • अशोकनगर: 46.53%
  • पन्ना: 45.26%
  • सतना: 43.34%
  • अलीराजपुर: 42.78%
  • छतरपुर: 42.77%
  • सिंगरौली: 40.62%
  • मैहर: 40.20%

सरकार ने बताई कम कवरेज की वजह

केंद्र को दी गई जानकारी में मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने इन जिलों में कम कवरेज की एक वजह बहु-ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं और दूसरी जलापूर्ति योजनाओं पर निर्भरता बताई है। इनमें कई योजनाएं अभी निर्माण, क्रियान्वयन या पूरा होने के अलग-अलग चरणों में हैं।

यानी कई इलाकों में पाइपलाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का काम चल रहा है, लेकिन उसका अंतिम लाभ अभी सभी परिवारों तक नहीं पहुंच पाया है।

भोपाल में भी पानी को लेकर बढ़ी चिंता

पानी की समस्या सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है। मार्च 2026 में भूजल स्तर में गिरावट के बाद भोपाल जिले को जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था। इसके बाद नए निजी बोरवेल की खुदाई पर रोक लगाई गई। प्रशासन ने इसकी वजह भूजल का अत्यधिक दोहन और लगातार गिरता जलस्तर बताया था।

इससे साफ है कि राजधानी समेत मध्यप्रदेश के सामने चुनौती केवल पाइपलाइन बिछाने की नहीं, बल्कि उपलब्ध जल स्रोतों को बचाए रखने की भी है।

77.21% कनेक्शन काम करते मिले, फिर भी सवाल बाकी

जल जीवन मिशन के तहत किए गए नवीनतम कार्यशीलता आकलन में मध्यप्रदेश में 77.21 फीसदी परिवारों के नल जल कनेक्शन कार्यशील पाए गए। लेकिन इसी आकलन में पानी की पर्याप्त मात्रा, नियमित आपूर्ति और पेयजल की गुणवत्ता में सुधार की जरूरत भी सामने आई।

यहीं से मध्यप्रदेश की ‘हर घर नल’ कहानी का सबसे बड़ा सवाल निकलता है।

नल लगा है या नहीं, यह पहला सवाल है।
नल में पानी आता है या नहीं, दूसरा।
पानी रोज और पर्याप्त आता है या नहीं, तीसरा।
और जो पानी आता है, वह पीने लायक है या नहीं, असली सवाल चौथा है।

पानी पहुंचा, लेकिन कितना सुरक्षित?

जल गुणवत्ता को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। सरकारी जवाब के मुताबिक मध्यप्रदेश में 155 जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। इनमें 103 उपमंडल स्तर, 51 जिला स्तर और एक राज्य स्तर की प्रयोगशाला है।

सरकारी जानकारी में यह भी कहा गया है कि बीओडी की जांच राज्य स्तरीय प्रयोगशाला में की जा सकती है, जबकि रासायनिक विषाक्तता की जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

यानी जल जीवन मिशन की सफलता को केवल कनेक्शन की संख्या से मापना तस्वीर का आधा हिस्सा देखना होगा।

99% गांवों में पाइपलाइन, लेकिन नलों की कहानी अभी अधूरी

जनवरी 2026 में सामने आई कार्यशीलता आकलन रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश के 99.1 फीसदी गांवों में पाइप जलापूर्ति व्यवस्था मौजूद थी, लेकिन केवल 76.6 फीसदी परिवारों के नल कार्यशील पाए गए। वहीं ग्रामीण इलाकों से लिए गए पानी के नमूनों में 63.3 फीसदी नमूने ही गुणवत्ता जांच में पास हुए थे, जबकि राष्ट्रीय औसत 76 फीसदी बताया गया।