एक समय, अलग-अलग कैलेंडर: धर्मों ने दिन और साल को कैसे समझा?

समय को मापने का हर सभ्यता का अपना एक अलग तरीका रहा है। जब बात धर्म की आती है, तो यह गणना केवल गणित और विज्ञान तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि यह गहरी आस्था और सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा बन जाती है। चाँद देखना हो, तिथि गिननी हो या सूर्य की चाल नापनी हो, दुनिया के पांच प्रमुख धर्मों में समय और तारीखें तय करने के अलग-अलग नियम हैं।
आइए समझते हैं कि इस्लाम, हिंदू, सिख, यहूदी और पारसी धर्मों में धार्मिक कैलेंडर कैसे काम करते हैं और त्योहारों की तारीखें कैसे तय होती हैं।
इस्लाम: रमज़ान का चाँद और हिजरी कैलेंडर
इस्लामी कैलेंडर पूरी तरह से चंद्र (लूनर) आधारित है। इसमें हर महीना चाँद की चाल के हिसाब से चलता है। चंद्र वर्ष में कुल 354 या 355 दिन होते हैं, जो सामान्य सौर वर्ष (Solar Year – 365 दिन) के मुकाबले 10 से 11 दिन छोटा होता है। यही कारण है कि रमज़ान और ईद का त्योहार हर साल 10-11 दिन पहले आ जाता है।
रमज़ान की शुरुआत और ईद की तारीख ‘हिलाल’ यानी नए चाँद की पहली पतली रेखा देखे जाने पर तय होती है। परंपरागत रूप से इसके लिए विश्वसनीय लोगों द्वारा चाँद देखा जाना जरूरी है। हालांकि, अब कई देश खगोलीय गणना का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके चलते अलग-अलग देशों में ईद की तारीखों में कभी-कभी एक दिन का फर्क देखने को मिलता है। इस्लामिक हिजरी कैलेंडर की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद के मक्का से मदीना हिजरत (622 ईस्वी) से मानी जाती है।
हिंदू धर्म: तिथि और पंचांग का सटीक गणित
हिंदू कैलेंडर चंद्र और सूर्य दोनों की चाल पर आधारित है, जिसे लूनी-सोलर (Lunisolar) कैलेंडर कहा जाता है। इसमें दिनों की नहीं, बल्कि ‘तिथि’ की गिनती होती है। तिथि वह समय है, जितनी देर में चाँद और सूरज के बीच का कोणीय अंतर 12 डिग्री बढ़ जाता है। एक तिथि 19 से 26 घंटे तक की हो सकती है। कभी-कभी एक ही दिन में दो तिथियां पड़ जाती हैं, या कोई तिथि “क्षय” (गायब) हो जाती है।
हिंदू कैलेंडर में महीने में 30 तिथियां होती हैं—15 दिन शुक्ल पक्ष (चाँद बढ़ने का समय) और 15 दिन कृष्ण पक्ष (चाँद घटने का समय)। दिवाली, होली, दशहरा और जन्माष्टमी जैसे प्रमुख त्योहार इसी तिथि प्रणाली से तय होते हैं, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर (ग्रेगोरियन) में इनकी तारीखें हर साल बदलती रहती हैं। भारत में विक्रम संवत और शक संवत जैसे कई पंचांग प्रचलित हैं।
सिख परंपरा: बिक्रमी से नानकशाही तक का सफ़र
सिख धर्म में शुरुआती दौर में बिक्रमी (लूनी-सोलर) कैलेंडर का इस्तेमाल होता था, जिससे गुरुपर्व और ऐतिहासिक दिन तय होते थे। लेकिन इसमें भी त्योहारों की तारीखें हर साल बदलती रहती थीं।
इस समस्या को सुलझाने के लिए कनाडा में रहने वाले सिख इंजीनियर पाल सिंह पुरेवाल ने एक पूरी तरह सौर (सोलर) कैलेंडर तैयार किया, जिसे 1999 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने अपनाया। इसे ‘नानकशाही कैलेंडर’ कहा गया। इसका मकसद था कि गुरुपर्व और ऐतिहासिक दिन हर साल एक ही तारीख पर आएं (जैसे क्रिसमस 25 दिसंबर को आता है)।
हालांकि, इसे लेकर कुछ विवाद भी हुए। परंपरावादी सिख मानते थे कि कुछ त्योहार पुराने तरीके से ही मनाए जाने चाहिए। इसके चलते 2003 में इसे संशोधित किया गया और गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व, होला मोहल्ला और बंदी छोड़ दिवस को पुरानी बिक्रमी पद्धति के हिसाब से ही रखा गया।
यहूदी धर्म: चाँद की गवाही से गणितीय कैलेंडर तक
यहूदी कैलेंडर भी हिंदू कैलेंडर की तरह लूनी-सोलर (चंद्र-सौर) है। प्राचीन काल में यरूशलेम की अदालत ‘सैनहेड्रिन’ गवाहों की चाँद-दर्शन की गवाही सुनकर नए महीने की घोषणा करती थी।
करीब चौथी शताब्दी में धर्मगुरु हिलेल द्वितीय ने एक गणितीय फॉर्मूला बनाया, ताकि दुनिया भर में फैले यहूदी बिना गवाहों के एक ही तारीख पर त्योहार मना सकें। चूंकि 12 चंद्र महीने सौर वर्ष से करीब 11 दिन छोटे होते हैं, इसलिए संतुलन बनाने के लिए हर 19 साल के चक्र में 7 बार एक अतिरिक्त महीना (अधिक मास) जोड़ा जाता है, ताकि ‘पेसाह’ (Passover) जैसा अहम त्योहार हमेशा वसंत ऋतु में ही पड़े।
पारसी धर्म: सूर्य और अग्नि से जुड़ा कैलेंडर
पारसी (ज़ोरोस्ट्रियन) परंपरा में कैलेंडर पूरी तरह सौर है, जिसकी जड़ें प्राचीन ईरानी सभ्यता में हैं। अवेस्ता ग्रंथ में सूर्य, अग्नि और प्रकाश को पवित्र माना गया है।
पारसी समुदाय में आज तीन तरह के कैलेंडर चलन में हैं—शहनशाही, क़दीमी और फ़सली। तीनों कैलेंडर साल को 365 दिन का मानते हैं और इनमें लीप ईयर (Leap Year) का कोई प्रावधान नहीं है। इस वजह से सदियों में इनकी तारीखें असली मौसम-चक्र से काफी आगे खिसक गईं। भारत में ज्यादातर पारसी शहनशाही कैलेंडर से ‘नवरोज़’ मनाते हैं, जबकि ईरान में वसंत विषुव (Spring Equinox) पर आधारित फ़सली कैलेंडर ज्यादा चलन में है।

