वोटर लिस्ट के SIR पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे ओवैसी, 27 मई के फैसले को चुनौती

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल की है, जिसमें अदालत ने SIR को बरकरार रखा था। अपनी याचिका में उन्होंने चुनाव आयोग (Election Commission) की निर्णय लेने की प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में कथित अनियमितताओं का हवाला दिया है।
ओवैसी की याचिका में मुख्य मांगें
असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट से तीन प्रमुख मांगे की हैं:
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27 मई, 2026 को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा की जाए।
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इस फैसले को वापस लेने (Recall) पर विचार किया जाए।
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SIR को लागू करने के लिए चुनाव आयोग की तरफ से जारी किए गए आदेशों को रद्द किया जाए।
चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों का हवाला
याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के भीतर लिए जा रहे फैसलों में एकरूपता नहीं थी। ओवैसी ने आरोप लगाया है कि करीब 10 महीने की अवधि के दौरान, दो चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 मौकों पर ऐसे फैसलों पर आपत्ति दर्ज की, जिन्हें कथित तौर पर उनकी पूर्व मंजूरी के बिना लिया गया था।
याचिका के अनुसार, इन आपत्तियों का सीधा संबंध फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने, नाम बहाल करने के खिलाफ अपील और वोटर लिस्ट के डेटाबेस को सेंट्रलाइज करने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से था।
यूपी में 85 हजार से ज्यादा फॉर्म 7 ऑटो-जनरेटेड!
याचिका में एक मीडिया जांच (‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की पड़ताल) का भी हवाला दिया गया है। इसके जरिए दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए बड़े पैमाने पर कथित गड़बड़ियां हुई हैं।
याचिका के मुताबिक, यूपी में नाम हटाने के लिए कुल 87,127 फॉर्म 7 अनुरोध दाखिल किए गए थे। इनमें से 85,854 फॉर्म कथित तौर पर ‘ऑटो जनरेट’ (Auto-Generated) किए गए थे और इनमें नाम हटाने के पीछे किसी भी कारण का जिक्र नहीं किया गया था।
गोवा का सॉफ्टवेयर विवाद और कानून के उल्लंघन का आरोप
यूपी के अलावा ओवैसी ने अपनी याचिका में गोवा का भी उदाहरण पेश किया है। उन्होंने दावा किया कि गोवा में 97 मतदाताओं को योग्य पाए जाने के बावजूद वोटर लिस्ट से बाहर रखा गया। इसका कारण यह बताया गया कि चुनाव आयोग के संबंधित सॉफ्टवेयर में उनके नाम बहाल करने का विकल्प या सुविधा कथित तौर पर मौजूद ही नहीं थी।
इन सभी उदाहरणों के साथ, AIMIM चीफ की याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून की धारा 18 के कथित उल्लंघन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि 27 मई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जिन वैधानिक सुरक्षा उपायों पर भरोसा जताया था, नए खुलासों के बाद उनकी वास्तविक प्रभावशीलता सवालों के घेरे में आ गई है।

