ईरान ने कनाडा को सुनाई खरी-खरी, तीन द्वीपों पर संप्रभुता का किया दावा

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में स्थित तीन ईरानी द्वीपों—अबू मूसा, ग्रेटर तुनब और लेसर तुनब—को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कनाडा द्वारा जारी संयुक्त बयान की कड़ी निंदा की है।
बघाई ने शनिवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में यूएई के क्षेत्रीय दावों को बेतुका और कनाडा के समर्थन को अदूरदर्शी बताते हुए कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
‘यूएई से भी पुराने हैं हमारे द्वीप’
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड और भौगोलिक तथ्यों का हवाला देते हुए यूएई के दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात की स्थापना 1971 में हुई थी, जबकि इन द्वीपों का ईरान का हिस्सा होने का इतिहास फेडरेशन की स्थापना से कई हजार साल पुराना है।
कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी (Mark Carney) पर निशाना साधते हुए बघाई ने कहा, “हैरानी की बात है कि कनाडा के प्रधानमंत्री ने इस बेतुके दावे को दोहराने का फैसला किया है!“
कनाडा को दिलाया 1812 के युद्ध का इतिहास याद
बघाई ने कनाडा को उसकी अपनी क्षेत्रीय अखंडता के संघर्ष की याद दिलाई। उन्होंने 1812 के युद्ध के दौरान अमेरिकी आक्रमण, 1849 के मॉन्ट्रियल एनेक्सेशन मेनिफेस्टो और डोनाल्ड ट्रंप की कनाडा को 51वां अमेरिकी राज्य बनाने की धमकियों का जिक्र किया।
बघाई ने सवाल किया, “एक ऐसा देश जिसने दो सदियों से अधिक समय तक अपने दक्षिणी पड़ोसी की महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा की है—वह एक मनगढ़ंत विवाद में कैसे पक्ष ले सकता है? क्या क्षेत्रीय अखंडता कनाडा के लिए केवल तभी मायने रखती है जब उसकी खुद की संप्रभुता दांव पर हो?“
क्या था कनाडा और UAE का बयान?
इस हफ्ते की शुरुआत में, कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और यूएई के राष्ट्रपति शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने एक संयुक्त बयान जारी किया था। इसमें तीनों द्वीपों के तथाकथित “कब्जे” को समाप्त करने का आह्वान करते हुए आरोप लगाया गया था कि यह यूएई की संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
क्या है द्वीपों का इतिहास?
बघाई ने स्पष्ट किया कि अबू मूसा, ग्रेटर तुनब और लेसर तुनब ईरानी क्षेत्र के अविभाज्य हिस्से हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1921 में इन द्वीपों पर ब्रिटिश नियंत्रण हो गया था। लेकिन 30 नवंबर, 1971 को—ब्रिटिश सेना के क्षेत्र छोड़ने के एक दिन बाद और यूएई के आधिकारिक महासंघ बनने से ठीक दो दिन पहले—इन द्वीपों पर ईरान की संप्रभुता बहाल हो गई थी। तब से ईरान इन क्षेत्रों पर निरंतर नियंत्रण रख रहा है और इन्हें आधिकारिक रूप से पंजीकृत कर चुका है। हाल ही में ईरान ने 30 नवंबर को इन तीनों द्वीपों के लिए ‘राष्ट्रीय दिवस’ के रूप में भी नामित किया है।
अंत में बघाई ने यूएई सरकार को सलाह दी कि वह एक प्रमुख पड़ोसी देश के खिलाफ क्षेत्रीय दावों को दोहराने के बजाय ‘अच्छे पड़ोसी’ के सिद्धांत का पालन करे।

