अमेरिका-इजरायल पर चीन का तीखा वार, ली ने UN मंजूरी पर उठाए सवाल

चीन ने ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए सैन्य हमलों की कड़ी निंदा की है। ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान चीनी प्रीमियर ली कियांग ने ईरानी प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ से मुलाकात की। इस दौरान ली ने इन स्ट्राइक्स को ‘खुला आक्रामण’ (blatant aggression) करार दिया और एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों का कड़ा विरोध जताया।
बिना UN की मंजूरी के हमला संप्रभुता का उल्लंघन
चीनी प्रीमियर ली कियांग ने स्पष्ट किया कि ईरान पर किए गए ये हमले ऐसे वक्त में हुए हैं जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) से कोई मंजूरी नहीं ली गई थी।
चीन इसे ईरानी संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सीधा उल्लंघन बता रहा है। ली ने इस्लामाबाद समझौते को फिर से जीवित करने का समर्थन किया और ईरानी नेतृत्व को आश्वासन दिया कि बीजिंग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान के वैध अधिकारों की रक्षा करना जारी रखेगा।
शी जिनपिंग की प्रतिक्रिया और युद्ध का नुकसान
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अलग से मध्य पूर्व के मौजूदा हालात पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। शी जिनपिंग ने कहा कि यह संघर्ष भारी नुकसान पहुंचा रहा है और यह दुनिया के हितों के अनुकूल नहीं है। बीजिंग लगातार एकतरफा सैन्य अभियानों को तुरंत रोकने और कूटनीतिक रास्ते पर लौटने की मांग कर रहा है।
खामेनेई की हत्या और ‘सत्ता परिवर्तन’ का विरोध
विवाद की शुरुआत फरवरी के अंत में ईरान पर हुए अमेरिकी-इजरायली हमलों से हुई थी। इनमें IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) की निगरानी वाले ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया था। चीनी अधिकारियों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या और अमेरिका समर्थित ‘सत्ता परिवर्तन’ (regime change) की कोशिशों की सख्त निंदा की है।
कूटनीतिक ध्रुवीकरण और ऊर्जा बाजारों पर मंडराता खतरा
चीन ईरान का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार और उसके तेल का प्रमुख खरीदार है। फिलहाल बीजिंग सीधे सैन्य हस्तक्षेप के बजाय तेहरान को राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक कवर प्रदान कर रहा है।
चीन के इस रुख ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ कूटनीतिक विभाजन को और गहरा कर दिया है, जहां चीन खुले तौर पर ईरान और रूस के साथ खड़ा नजर आ रहा है। खाड़ी क्षेत्र में जारी इस युद्ध से वैश्विक ऊर्जा बाजारों, तेल परिवहन और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर बड़े जोखिम पैदा हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के तर्क का इस्तेमाल कर चीन खुद को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के रक्षक के तौर पर पेश कर रहा है।

