कांग्रेस का दोहरा चरित्र: संवैधानिक पदों को राजनीतिक इनाम की पुरानी आदत

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल जी ने कांग्रेस पर जो आरोप लगाए हैं, वे सिर्फ सियासी हमला नहीं हैं। ये इतिहास के उन पन्नों की याद दिलाते हैं जब कांग्रेस ने चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान को अपनी राजनीतिक सुविधा का अखाड़ा बना रखा था। गोयल का इशारा दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों—टी.एन. शेषन और एम.एस. गिल—की ओर है। तारीखें साफ हैं, घटनाएं दर्ज हैं। अब सवाल यह है कि कांग्रेस आज चुनाव आयोग पर उंगली उठाते हुए अपनी पुरानी करतूतों को क्यों भूल जाती है?
टी.एन. शेषन: ईमानदारी की तारीफ से टिकट तक का सफर
टी.एन. शेषन 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उन्होंने चुनाव सुधारों को नई ऊंचाई दी। खर्च की सीमा, आचार संहिता और निष्पक्षता के नाम पर वे राजनेताओं के लिए डरावना नाम बन गए थे। कांग्रेस खुद उनकी “ईमानदारी और निडरता” की तारीफ करती थी।
लेकिन रिटायरमेंट के महज तीन साल बाद क्या हुआ?
अगस्त 1999 में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात की गांधीनगर लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। सामने थे लालकृष्ण आडवाणी। शेषन ने 18 अगस्त 1999 को नामांकन दाखिल किया और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। नतीजा पता है—आडवाणी जीते, शेषन हारे।
जो व्यक्ति चुनाव आयोग में बैठकर राजनेताओं को “नाश्ते में खाता” था, उसी को कांग्रेस ने अपने टिकट पर मैदान में उतार दिया। क्या यह पुरस्कार नहीं था? क्या संवैधानिक पद की गरिमा को राजनीतिक सौदेबाजी में तब्दील करने का उदाहरण नहीं था?
एम.एस. गिल: पद पर रहते पद्म विभूषण, फिर मंत्री पद
एम.एस. गिल 12 दिसंबर 1996 से 13 जून 2001 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल में 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव हुए।
साल 2000 में, जब वे अभी पद पर थे, उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलना सामान्य नहीं माना जाता।
रिटायरमेंट के ठीक तीन साल बाद रास्ता खुल गया।
अप्रैल 2004 में वे कांग्रेस के टिकट पर पंजाब से राज्यसभा पहुंचे। 6 अप्रैल 2008 को मनमोहन सिंह सरकार में युवा मामले एवं खेल मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए। बाद में वे कैबिनेट स्तर के मंत्री भी रहे।
पद पर रहते सम्मान, रिटायरमेंट के बाद पार्टी में प्रवेश, राज्यसभा और फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल। इससे बड़ा “इनाम” क्या हो सकता है?
संवैधानिक गरिमा बनाम राजनीतिक सुविधा
ये दोनों मामले कांग्रेस की उस मानसिकता को उजागर करते हैं जिसमें संवैधानिक पदों को भी पार्टी की सेवा का माध्यम बनाया जाता रहा। शेषन को टिकट देना और गिल को मंत्री बनाना—दोनों घटनाएं एक ही सोच की उपज लगती हैं। जब तक अधिकारी “उपयोगी” रहे, तारीफ हुई। जब राजनीतिक जरूरत पड़ी, उन्हें पार्टी का हिस्सा बना लिया गया।
आज कांग्रेस चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है। लेकिन इतिहास याद दिलाता है कि उसी पार्टी ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को टिकट और मंत्री पद देकर संस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए थे। तारीखें झूठ नहीं बोलतीं।
1999, 2000, 2004, 2008—ये साल कांग्रेस के दोहरे चरित्र की गवाही देते हैं। संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखने की बात करने से पहले अपनी पुरानी करतूतों का आईना देख लेना चाहिए।

