संकट के बीच हरीश रावत ने कौन-सा पुराना सियासी फॉर्मूला फिर आजमाया

उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत नया नाम नहीं हैं। तीन बार मुख्यमंत्री, कई संकटों के पारंगत खिलाड़ी। जब भी पार्टी या खुद पर दबाव बढ़ा है, उन्होंने कोई न कोई ऐसा कदम उठाया है जो पहली नजर में त्याग लगे, लेकिन अंदर से राजनीतिक गणित संभाले। इस बार भी वही शैली दिखी है। प्रवर्तन निदेशालय ने उनके करीबी चंदन सिंह जीना के यहां कार्रवाई की। मामला 2016 की वीपीडीओ भर्ती परीक्षा से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का है। कांग्रेस शासनकाल की परीक्षा। ठीक उसी समय जब कांग्रेस 2027 के चुनाव से पहले भाजपा पर बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती घोटालों का हमला बोलने की तैयारी कर रही थी। रावत ने संगठनात्मक पदों से हटने की पेशकश कर दी।यह पेशकश संयोग नहींरावत की राजनीति हमेशा से संदेशों की राजनीति रही है। वे जानते हैं कि उत्तराखंड में भर्ती और रोजगार युवाओं का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। अगर विपक्ष के वरिष्ठ नेता के करीबी पर पुरानी भर्ती में गड़बड़ी का ठप्पा लगता है, तो कांग्रेस का पूरा नैरेटिव कमजोर पड़ जाता है। भाजपा तुरंत पलटवार कर सकती है—“आपके राज में क्या हुआ था?” पद छोड़ने की पेशकश से रावत ने दो काम एक साथ किए। पहला, पार्टी को इस विवाद से थोड़ी दूरी पर रखा। दूसरा, खुद को “पार्टी हित के लिए त्याग करने वाले नेता” के रूप में पेश किया। प्रस्ताव मंजूर हो या न हो, दोनों सूरतों में वे नुकसान कम कर सकते हैं। मंजूर हुआ तो कहा जाएगा कि उन्होंने जिम्मेदारी ली। नहीं मंजूर हुआ तो कहा जाएगा कि पार्टी ने उन पर भरोसा जताया।2027 का असली दांवरावत पहले ही कह चुके हैं कि 2027 का चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन पार्टी के लिए सक्रिय रहेंगे। यानी मैदान में सीधे नहीं उतरना, लेकिन प्रभाव बनाए रखना। ऐसे में यह कदम उनके लिए व्यक्तिगत सफाई भी है और पार्टी की चुनावी रणनीति को बचाने की कोशिश भी।कांग्रेस के लिए चुनौती बड़ी है। भर्ती और भ्रष्टाचार का मुद्दा भाजपा पर चलाना है, लेकिन अपना पुराना रिकॉर्ड भी साथ लेकर चलना है। रावत का यह कदम पार्टी को थोड़ी सांस लेने की जगह देता है। लेकिन अगर जांच आगे बढ़ी और बड़े नाम सामने आए तो यह बचाव भी अपर्याप्त साबित हो सकता है।भाजपा के लिए मौका, लेकिन आसान नहींभाजपा इसे कांग्रेस काल की गड़बड़ियों पर कार्रवाई बताकर अपना भ्रष्टाचार विरोधी चेहरा चमकाना चाहेगी। पुष्कर सिंह धामी सरकार नकल विरोधी कानून और नई भर्तियों को अपनी उपलब्धि बताती रही है। पुराना मामला उनके लिए सुविधाजनक है। लेकिन उत्तराखंड का युवा सिर्फ पुरानी जांच से संतुष्ट नहीं होगा। उसे मौजूदा भर्तियों की रफ्तार, पारदर्शिता और अवसर भी देखने हैं। इसलिए भाजपा को पुराने मामले के साथ अपना वर्तमान रिकॉर्ड भी मजबूत रखना होगा।रावत की पुरानी आदतहरीश रावत की ताकत यह रही है कि वे संकट को व्यक्तिगत से राजनीतिक में बदलने से पहले खुद को थोड़ा पीछे ले जाते हैं। फिर मैदान को पार्टी के लिए बचाए रखते हैं। इस बार भी वही कोशिश दिख रही है। पद छोड़ने की पेशकश त्याग की तरह पेश की गई है, लेकिन इसका असल मकसद कांग्रेस के 2027 वाले हमले को जिंदा रखना है। जांच की दिशा अब तय करेगी कि यह कदम कितना सफल होता है। अगर मामला सीमित रहा तो रावत फिर एक बार बच निकले माने जाएंगे। अगर फैला तो उत्तराखंड कांग्रेस के लिए भारी बोझ बन सकता है। 2027 में लड़ाई हरीश रावत बनाम भाजपा की नहीं होगी। लड़ाई होगी कि युवा किसे भर्ती और रोजगार पर ज्यादा विश्वास करता है। रावत ने अभी सिर्फ इतना किया है कि पार्टी को इस लड़ाई में पीछे धकेलने से बचाने की कोशिश की है। बाकी खेल जांच और आने वाले महीनों के सियासी दांव-पेच तय करेंगे।

