हर हर महादेव क्यों, हर हर राम या हर हर कृष्ण क्यों नहीं?

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

मै गुरु गोरखनाथ की धरती गोरखपुर से हूँ एक सवाल था मन में उसका जवाब कई धर्म गुरुओं से जानने की अभी अभिलाषा थी और कई महीनों की मेहनत के बाद उसका जवाब मिला और अब आप भी जानिए। सनातन परंपरा में नाम और उच्चारण का अपना महत्व है। “हर हर महादेव” का जाप बहुत प्रचलित है। लोग पूछते हैं—जब हर हर महादेव हो सकता है, तो हर हर राम या हर हर कृष्ण क्यों नहीं कहा जाता? ये मेरे मन में भी था और जवाब मिला यह प्रश्न श्रद्धा का है। इसका उत्तर परंपरा, भाषा और भाव में छिपा है।“हर” शब्द का अर्थसंस्कृत में “हर” का अर्थ है—हरने वाला, दूर करने वाला। जो पाप, दुख, अज्ञान और भय को हर ले। शिव को “हर” कहा गया है क्योंकि वे संहार के साथ-साथ कल्याण करने वाले भी हैं। “महादेव” उनका विशेषण है—देवताओं के भी महान देव।इसलिए “हर हर महादेव” का भाव बनता है—हे हरने वाले महादेव, हे महादेव जो सब कुछ हर सकते हैं। यह आह्वान भी है, स्मरण भी और समर्पण भी।राम और कृष्ण के लिए भी “हरि” शब्द प्रयुक्त होता है। विष्णु के लिए “हरि” अत्यंत प्रिय नाम है। “हरि” का अर्थ भी हरने वाला ही है। इसलिए “जय श्री राम”, “हरे कृष्ण”, “हरे राम” जैसे उच्चारण परंपरा में गहरे जुड़े हैं। “हर हर राम” या “हर हर कृष्ण” भाषाई दृष्टि से असंभव नहीं, लेकिन प्रचलन में वे उतने स्थापित नहीं हुए।परंपरा और प्रचलन का फर्कशिव भक्ति में “हर हर महादेव” का जाप सदियों से चला आ रहा है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह युद्ध भूमि से लेकर मंदिर तक गूंजता रहा। भाव की तीव्रता और सामूहिक उच्चारण ने इसे और लोकप्रिय बना दिया।राम भक्ति की धारा में तुलसीदास ने “राम” नाम को सर्वोपरि माना। “राम राम”, “जय श्री राम”, “सीताराम” जैसे रूप अधिक प्रचलित हुए। कृष्ण भक्ति में चैतन्य महाप्रभु की परंपरा ने “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” महामंत्र को केंद्र में रखा। यहां “हरे” और “कृष्ण-राम” का मेल पहले से मौजूद है।अर्थात प्रत्येक परंपरा ने अपने इष्ट के नाम को जिस रूप में जपा, वही रूप लोक में बस गया। कोई रूप गलत नहीं, कोई रूप कमतर नहीं।एक ही तत्त्व, अनेक नामसनातन दृष्टि में शिव, राम और कृष्ण अलग-अलग नहीं। एक ही परमतत्त्व के भिन्न स्वरूप हैं। शिव जहां वैराग्य और लय के प्रतीक हैं, राम मर्यादा और कर्तव्य के, कृष्ण प्रेम और लीला के। नाम भिन्न हैं, गंतव्य एक है।जब कोई “हर हर महादेव” कहता है तो वह शिव तत्त्व को पुकारता है। जब कोई “जय श्री राम” या “हरे कृष्ण” कहता है तो उसी परमतत्त्व को दूसरे नाम से पुकारता है। भाव शुद्ध हो तो नाम का अंतर बाधा नहीं बनता।“हर हर महादेव” इसलिए अधिक प्रचलित है क्योंकि शिव भक्ति की परंपरा ने इस विशेष संयोजन को अपनाया और उसे जन-जन तक पहुंचाया। राम और कृष्ण के लिए भी उतने ही शक्तिशाली और प्राचीन मंत्र उपलब्ध हैं—बस उनका स्वरूप अलग है।धर्म का सार नाम जपने में नहीं, भाव में है। चाहे कोई महादेव कहे, राम कहे या कृष्ण—यदि हृदय में श्रद्धा और समर्पण है तो सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। अंत में यही समझना चाहिए—नाम अनेक हैं, नामी एक है।

फिर “हर हर राम” क्यों नहीं?

राम के साथ पारंपरिक जयघोष अलग हैं, जैसे:

  • जय श्री राम
  • सियावर रामचंद्र की जय
  • श्री राम जय राम जय जय राम
  • राम नाम सत्य है

इसी तरह कृष्ण के साथ:

  • हरे कृष्ण
  • राधे राधे
  • जय श्री कृष्ण
  • राधे कृष्ण

यहाँ एक दिलचस्प भाषाई मोड़ है। “हरे कृष्ण” में “हरे” और “हर हर महादेव” का “हर” सुनने में समान लग सकता है, लेकिन उनका धार्मिक और व्याकरणिक संदर्भ अलग है।

असल बात

हिंदू परंपरा में अलग-अलग देवताओं के लिए अलग-अलग मंत्र, नाम-जप और उद्घोष विकसित हुए हैं। यह कोई नियम नहीं है कि हर देवता के नाम के आगे “हर हर” लगाया जाए।

इसलिए “हर हर महादेव” शिव-परंपरा का विशिष्ट जयघोष है, जबकि राम और कृष्ण के अपने पारंपरिक उद्घोष हैं।

और हाँ, कोई व्यक्ति अपनी भक्ति में “हर हर राम” या “हर हर कृष्ण” कहे तो उसका अर्थ समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन वह पारंपरिक/प्रचलित जयघोष नहीं है।