Lust Stories 3: सेक्स से आगे रिश्तों और इच्छाओं की कहानी, कैसी है फिल्म?

हमारे समाज में औरतों की सेक्सुअल जरूरतों और इच्छाओं को हमेशा से एक गैर-जरूरी और ‘टैबू’ (Taboo) विषय माना गया है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’, ‘थैंक यू फॉर कमिंग’ और ‘लस्ट स्टोरीज’ जैसी फिल्मों व एंथोलॉजी ने इस विषय को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है प्यार और रिश्तों की जटिलताओं की पड़ताल करती नई एंथोलॉजी ‘लस्ट स्टोरीज 3’ (Lust Stories 3)।
इस बार इंडस्ट्री के चार नामी निर्देशकों—विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज—की साझेदारी से चार शॉर्ट फिल्मों की यह माला तैयार की गई है, जिसमें दो कहानियां महिलाओं की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों के अहम पहलू पर जोर देती हैं।
चार निर्देशकों की चार अलग कहानियां
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विक्रमादित्य मोटवाने की कहानी: उम्र के 40वें साल में मिड-लाइफ क्राइसिस से गुजर रहीं दो पक्की सहेलियों—शोना (कोंकणा सेन शर्मा) और पद्मा उर्फ पैडी (राधिका आप्टे)—की यह कहानी है। कोरियन शोज देखने वाली इन दोनों सहेलियों की सेक्स लाइफ लगभग ठप हो चुकी है और उनके पतियों (क्रमशः अभिषेक बनर्जी और विजय वर्मा) को उनकी भावनाओं की कोई परवाह नहीं है। तंग आकर शोना और पैडी अपने पतियों की ‘अदला-बदली’ (Swapping) की योजना बनाती हैं।
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किरण राव की कहानी: यह कहानी एक डिलीवरी बॉय करण (गुरफतेह सिंह पीरजादा) और नेल आर्टिस्ट लीसा (सना थंपी) के बीच पहली मुलाकात में उपजे आकर्षण और धोखेबाजी की एक मॉडर्न दास्तान है। दोनों के बीच का जिस्मानी खिंचाव किस तरह धोखे का सबब बनता है, इसे इसमें दिखाया गया है।
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शकुन बत्रा की कहानी: यह कहानी तलाक की कगार पर पहुंच चुके एक जोड़े—वरुण आप्टे (अली फजल) और सायली वैद्य (राधिका मदान)—की है। उनके उलझे हुए रिश्ते में इंटीमेसी (शारीरिक अंतरंगता) ही सुकून के दो पल की वजह बनती है। निर्देशक ने आज के दौर में जटिल हो चुके प्यार और शादी के रिश्ते को सुलझाने की कोशिश की है, जिसमें पैशनेट लव, बातचीत और थेरेपी के महत्व पर जोर दिया गया है।
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विशाल भारद्वाज की कहानी: यह इस एंथोलॉजी की सबसे मजेदार और असरदार कहानी है। विशाल दर्शकों को 80 के दशक के हैदराबाद की गलियों में ले जाते हैं। यहां मंटो पढ़ती-पढ़ाती पीएचडी स्कॉलर सायरा (अदिति राव हैदरी) अपने हकीम शौहर डॉ. बदरू (सिद्धार्थ) के साथ उबाऊ और पारंपरिक वैवाहिक जीवन से आजिज आ जाती है। वह अंतरंग कल्पनाओं के रंगीन सपनों में इस कदर खोती है कि खुद एक सेक्स नॉवेल लेखिका (चुलबुली बेगम) बन बैठती है।
मूवी रिव्यू: कैसी है यह एंथोलॉजी?
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विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म: निर्देशक ने देसी महिला के अरमानों के साथ-साथ उसकी असुरक्षा, डर और जलन जैसे मनोभावों को दिखाने की कोशिश की है, लेकिन यह कहानी एक ‘शॉक वैल्यू’ (चौंकाने का भाव) से ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाती। पटकथा थोड़ी उथली है, जिसके चलते कोंकणा और राधिका जैसी दमदार एक्ट्रेसेस के बावजूद यह उतनी रिलेटेबल नहीं लगती।
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किरण राव की फिल्म: यह एक हल्की-फुल्की और टाइमपास कहानी साबित होती है। गुरफतेह और सना का काम ठीक-ठाक है।
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शकुन बत्रा की फिल्म: यह कहानी थोड़ी उलझी हुई जरूर महसूस होती है, लेकिन अली फजल और राधिका मदान की इंटेंस एक्टिंग के सहारे यह अपना संदेश और प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहती है।
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विशाल भारद्वाज की फिल्म: विशाल ने ‘लस्ट स्टोरीज’ की थीम को अपनी कहानी और उसके परिवेश से पूरी तरह न्याय करते हुए दिखाया है। हल्के-फुल्के टोन में औरतों की जिस्मानी जरूरतों को प्रगतिशील नजरिए से पेश करना इस कहानी की यूएसपी है। रियल लाइफ कपल अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ की केमिस्ट्री ने इसमें जान फूंक दी है। कुल मिलाकर, ‘लस्ट स्टोरीज 3’ के इस फोर-कोर्स मील में यह सबसे स्वादिष्ट व्यंजन साबित होता है।
रेटिंग: 2.5/5 (ढाई स्टार)

