अमेरिका से बातचीत के बाद अरागची पर महाभियोग प्रस्ताव, क्या है विवाद?

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे टकराव के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची (Abbas Araghchi) अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत को लेकर अपने ही देश में घिर गए हैं। स्थिति यह हो गई है कि ईरानी संसद में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दर्ज कर दिया गया है।
इस घटनाक्रम के बाद ईरान की टॉप लीडरशिप के बीच अंदरखाने गहरी फूट और मतभेद खुलकर सामने आते नजर आ रहे हैं।
अमेरिकी दूत से बातचीत पर उठे सवाल
यह पूरा विवाद न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दौरान अब्बास अरागची और अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ (Steve Witkoff) के बीच हुई गुप्त बैठक के बाद खड़ा हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच यह संपर्क कतर की मध्यस्थता में हुआ था।
अमेरिकी पक्ष ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया था, जबकि ईरान की ओर से कहा गया था कि इस दौरान देश की तय शर्तों और संदेशों को ही सामने रखा गया था। हालांकि, ईरानी संसद (मजलिस) के सदस्यों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।
सांसदों का आरोप: बिना अनुमति के हुई बात
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य अली खेज़्रियन ने जानकारी दी कि सांसदों ने अरागची के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया है।
सांसदों का मुख्य आरोप है कि अरागची को अमेरिकी अधिकारियों के साथ सीधे बातचीत करने की कोई अनुमति नहीं थी। उनका कहना है कि यह संपर्क ईरान की आधिकारिक विदेश नीति और संबंधित उच्चाधिकारियों की मंजूरी के दायरे से पूरी तरह बाहर जाकर किया गया।
संसद सदस्य अली खेज़्रियन ने स्पष्ट किया कि विदेश यात्रा से लौटने के बाद अरागची को संसद के सामने पेश होना होगा और यह जवाब देना होगा कि उन्होंने किस अधिकार और किस आधार पर अमेरिकी पक्ष से सीधी बातचीत की।
कट्टरपंथी समूहों का विरोध और आंतरिक कलह
ईरान में इस कूटनीतिक संपर्क को लेकर केवल सांसद ही नहीं, बल्कि कई कट्टरपंथी राजनीतिक समूह और मीडिया संस्थान भी हमलावर हैं। विवाद की मुख्य जड़ यह है कि क्या अरागची को अमेरिकी अधिकारियों से सीधे मिलने का अधिकार दिया गया था या नहीं।
ईरानी मीडिया में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि देश की तय योजना के मुताबिक ईरान के संदेश केवल मध्यस्थों के जरिए ही अमेरिका तक पहुंचाए जाने थे, न कि इस तरह आमने-सामने की बातचीत के जरिए।
यह पूरा विवाद ऐसे वक्त में सामने आया है जब एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक चैनल फिर से खुलने की चर्चा थी, तो दूसरी तरफ ईरानी सत्ता के भीतर इस कदम को लेकर भारी विरोध और अविश्वास का माहौल पैदा हो गया है।

