The Paradise Movie : पहले हाफ में दम, दूसरे हाफ में कहानी हुई कमजोर

The Paradise
Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

बदले और हक की लड़ाई वाली फिल्मों में एक्शन का होना जायज है, मगर हक और प्रतिशोध की इस जंग में जब हिंसा का अतिरेक (अत्यधिक खून-खराबा) हो जाता है, तो इमोशन और फिल्म के दूसरे मजबूत पहलू कहीं छिप जाते हैं। निर्देशक श्रीकांत ओडेला की नई फिल्म ‘द पैराडाइज’ (The Paradise) में हिंसा की ऐसी ही अति दिखाई गई है।

इस फिल्म में टॉलीवुड के ‘नेचुरल स्टार’ कहलाने वाले नानी की तमाम मेहनत, शानदार एक्टिंग और रोंगटे खड़े कर देने वाला एक्शन भी कहीं जाया होता हुआ नजर आता है। नतीजतन, यह फिल्म ‘KGF’ और ‘पेद्दी’ के मिश्रण जैसी लगने लगती है, जहां जज्बात और कहानी पर सिर्फ और सिर्फ हिंसा हावी हो जाती है।

‘द पैराडाइज’ की कहानी

कहानी 1980 के दशक के सिकंदराबाद की है, जहां ‘पैराडाइज’ नाम की एक बस्ती में ‘सवारी’ समुदाय बेहद बदहाल और अपमानजनक परिस्थितियों में जिंदगी गुजार रहा है। कहने को तो बस्ती का नाम पैराडाइज (स्वर्ग) है, मगर यहां रहने वाले लोग रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों से भी महरूम हैं। इस दबे-कुचले समुदाय पर ताकतवर मलिक (मोहन बाबू) का दबदबा है, जो वर्षों से उन पर अमानवीय जुल्म करता आया है।

इसी समुदाय का जदल (नानी) बचपन में प्रताड़ित होकर जेल पहुंचा था। उसकी मां शमाक्का (सोनाली कुलकर्णी) जिस्मफरोशी के दलदल में फंसकर बेइज्जती की जिंदगी जीने पर मजबूर है। अपनी मां से नफरत करने वाला जदल वर्षों बाद जेल से रिहा होकर लौटता है। लेकिन जब वह अपनी मां का सार्वजनिक अपमान देखता है, तो उसके भीतर बरसों से दबा गुस्सा भड़क उठता है। इसी दौरान उसकी जिंदगी में आई एक खूबसूरत लड़की (कयादू लोहार) उसे जीने और लड़ने का एक नया मकसद देती है।

अपने प्रतिशोध की शुरुआत करते हुए जदल सबसे पहले मलिक के बेटे विक्रम (राघव जुयाल) का सिर कलम कर देता है। इसके बाद जदल की निजी लड़ाई धीरे-धीरे पूरे सवारी समुदाय के हक, पहचान और सम्मान की जंग में बदल जाती है।

मूवी रिव्यू: कैसा है निर्देशन और प्रेजेंटेशन?

निर्देशक श्रीकांत ओडेला की कहानी मुख्यतः तीन ट्रैक्स पर चलती है – मां-बेटे का भावनात्मक रिश्ता, पहचान/हक की लड़ाई और व्यक्तिगत बदला।

  • फर्स्ट हाफ: फिल्म की शुरुआत मजबूत है। सेट डिजाइन, प्रोडक्शन डिजाइन, कलाकारों के कॉस्ट्यूम और मेकअप बस्ती और उसके किरदारों को विश्वसनीय बनाते हैं। लेकिन ब्लैक बैकड्रॉप में रची गई यह अंधेरी दुनिया, जहां लगातार बारिश और कीचड़ का बोलबाला रहता है, कई जगह यश स्टारर ‘KGF’ की याद दिलाती है।

  • सेकंड हाफ और कमजोरियां: निर्देशक ने फिल्म को अलग-अलग चैप्टर्स में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी बुरी तरह बिखरने लगती है। एक्शन सीक्वेंस में बढ़ती बर्बरता और गर्भवती महिलाओं के साथ दिखाई गई हिंसा कई जगह असहज करती है। एक पॉइंट के बाद यह लगातार उड़ते हुए सिर और कटे हुए अंग आपको थका देते हैं।

हां, तकनीकी स्तर पर फिल्म काफी मजबूत है। विजुअल्स और प्रेजेंटेशन प्रभावशाली हैं और एक्शन को बेहद स्टाइलिश तरीके से फिल्माया गया है।

एक्टिंग में किसने मारी बाजी?

  • नानी: एक्टिंग, इमोशन, डांस हो या एक्शन, नानी ने अपनी जान लगाकर शानदार काम किया है। उनका दो चोटी वाला लुक, तीव्रता और चपलता बेहद कमाल की है। फिल्म का पूरा फोकस उन्हीं पर है।

  • सोनाली कुलकर्णी: सीनियर एक्ट्रेस सोनाली को बड़े पर्दे पर मां के रूप में सबसे अहम और लंबे किरदार को जीने का मौका मिला है। वे पूरी फिल्म का केंद्र हैं और उन्होंने शिद्दत से अपने रोल को निभाया है।

  • राघव जुयाल और अन्य: नायिका कयादु लोहार फिल्म में थोड़ी राहत और रोमांस लाती हैं। लेकिन प्रतिभाशाली राघव जुयाल को फिल्म में बुरी तरह जाया कर दिया गया है। उन्हें बहुत कम स्क्रीन स्पेस मिला है। मोहन बाबू ने निगेटिव भूमिका में आतंक मचाया है, लेकिन उनके और हीरो के बीच का कॉन्फ्लिक्ट पर्दे पर उभर कर नहीं आ पाता।

क्यों देखें: अगर आप नानी के हार्डकोर फैन हैं और आपको अत्यधिक हिंसक फिल्में पसंद हैं, तभी इस फिल्म को देखने जाएं।

क्रिटिक रेटिंग: 2/5 (ढाई स्टार)