राज्यसभा चुनाव: 37 वोट चाहिए, 10वीं सीट पर क्रॉस वोटिंग का डर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव केवल मतदान की औपचारिकता भर नहीं होते। यह ऐसा मुकाबला होता है जहां विधानसभा में बैठे विधायकों की व्यक्तिगत प्राथमिकताएं और राजनीतिक समीकरण पार्टियों के पूरे अंकगणित को पलट देते हैं। 16 अक्टूबर 2026 को यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए होने जा रहे मतदान से पहले सियासी गलियारों में एक बार फिर क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं और नंबर गेम पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होने जा रहे इस मुकाबले में सवाल यही है कि क्या 2024 की पटकथा 2026 में फिर दोहराई जाएगी?
2024 का सबक: कागजी गणित बनाम मतदान का दिन
फरवरी 2024 में हुए राज्यसभा चुनाव में 10 सीटों के लिए 11 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। मुकाबला उस वक्त नाटकीय मोड़ ले चुका था जब समाजवादी पार्टी (सपा) के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर भाजपा के आठवें उम्मीदवार संजय सेठ के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी।
उस चुनाव में भाजपा ने 10 में से 8 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि सपा के खाते में केवल 2 सीटें आई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सपा के कम से कम छह विधायकों और सुभासपा (SBSP) के एक विधायक ने भाजपा के पक्ष में वोट डाला था।
तीन ‘अनअटैच्ड’ विधायक और 2026 का समीकरण
2024 के घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा सपा के तत्कालीन विधायकों मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह की हुई थी। इन तीनों विधायकों को जून 2025 में समाजवादी पार्टी ने निष्कासित कर दिया था। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में उन्हें ‘अनअटैच्ड मेंबर्स’ (गैर-संबद्ध सदस्य) के तौर पर मान्यता दी।
ये तीनों नेता आज भी विधानसभा के सदस्य हैं, लेकिन सपा के अधिकृत सदस्य नहीं हैं। ऐसे में 2026 के इस चुनाव में इन अनअटैच्ड विधायकों के वोटों की दिशा किस तरफ होगी, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। यदि किसी अतिरिक्त सीट पर मुकाबला फंसा, तो ये अतिरिक्त वोट एक बार फिर निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं।
37 प्रथम वरीयता वोटों का पेच
राज्यसभा चुनाव की मौजूदा दलीय स्थिति और विधानसभा के संख्या बल के अनुसार, एक सीट जीतने के लिए उम्मीदवार को करीब 37 प्रथम वरीयता (First Preference) वोटों की जरूरत होगी।
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जिन दलों के पास अपनी तय सीटों के लिए स्पष्ट संख्या बल है, उनके लिए राह आसान है।
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असली खींचतान और जोड़-तोड़ अतिरिक्त सीट के लिए बचे हुए सरप्लस वोटों और निर्दलीय या छोटे दलों के विधायकों को साधने पर शुरू होती है।
यहीं से पार्टियों के भीतर यह टोह लेने की कवायद शुरू हो जाती है कि कौन किसके संपर्क में है, किसकी क्या नाराजगी है और 2027 के विधानसभा टिकट को लेकर किसका क्या रुख है।
BJP और SP दोनों के सामने अलग-अलग चुनौतियां
इस चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के सामने अपनी-अपनी रणनीति साधने की चुनौती है:
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भाजपा (NDA): पार्टी के सामने अपने सहयोगियों और विधायकों के संख्या बल को एकजुट रखने के साथ-साथ अतिरिक्त उम्मीदवार को जिताने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने का लक्ष्य रहेगा।
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समाजवादी पार्टी: सपा के लिए केवल कागजों पर विधायकों की गिनती करना काफी नहीं होगा। पार्टी नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदान के दिन तक उसके खेमे में कितने ‘पक्के’ विधायक मजबूती से खड़े रहते हैं।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले ‘वफादारी की परीक्षा’
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस चुनाव की टाइमिंग बेहद अहम मानी जा रही है। पार्टियां अपने विधायकों के वोटिंग पैटर्न को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखेंगी। 2024 में क्रॉस वोटिंग करने वाले नेताओं पर हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई यह साबित कर चुकी है कि राज्यसभा में डाला गया वोट विधायक के राजनीतिक भविष्य और पार्टी से उसके रिश्ते को सीधे तौर पर तय करता है। ऐसे में 16 अक्टूबर का यह मुकाबला 2027 के बड़े सियासी इम्तिहान से पहले का एक अहम लिटमस टेस्ट साबित होने जा रहा है।
