सिकंदरपुर में बदलता रहा सियासी समीकरण, जानिए पूरा जातीय गणित

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी जमीन तलाशनी शुरू कर दी है। पूर्वांचल के बलिया जिले की सात विधानसभा सीटों में सिकंदरपुर (Sikanderpur) का सियासी मिजाज हमेशा से बदलाव पसंद रहा है। इस सीट की खासियत यह रही है कि यह किसी एक दल का स्थायी गढ़ नहीं बन सकी। कांग्रेस, निर्दलीय, जनता पार्टी, लोकदल, सपा, बसपा और भाजपा—मतदाताओं ने हर प्रमुख दल को यहां मौका दिया है।
1962 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर पहले चुनाव में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी विजयी हुए थे। इसके बाद से यहां कई दिग्गजों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिलती रही है।
जातीय समीकरण: क्षत्रिय, मुस्लिम, यादव और राजभर वोट बैंक निर्णायक
सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र में किसी एक जाति का एकतरफा दबदबा नहीं है, बल्कि कई जातियों का संतुलन यहां हार-जीत तय करता है:
-
राजपूत (क्षत्रिय): लगभग 10%
-
मुस्लिम: करीब 9%
-
यादव: लगभग 9%
-
राजभर: करीब 9%
-
ब्राह्मण: लगभग 5%
-
भूमिहार: करीब 4%
-
अन्य समुदाय: शेष मतदाता विभिन्न जातियों और समुदायों से आते हैं।
क्षत्रिय, मुस्लिम, यादव और राजभर मतदाताओं की गोलबंदी इस सीट पर चुनावी नतीजे तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाती है।
शुरुआती दौर: निर्दलीयों का दबदबा और कांग्रेस की वापसी
1962 में कांग्रेस की जीत के बाद 1967 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी राजा राम (आर. राम) ने कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी को 3,759 वोटों से हराकर उलटफेर किया। 1969 में मध्यावधि चुनाव हुए तो एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार निर्भय नारायण सिंह ने कांग्रेस के शिव मंगल सिंह को 13,026 मतों से हराया।
1974 में निर्भय नारायण सिंह कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे और जीत हासिल की। हालांकि, आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर में शिव मंगल सिंह विजयी रहे और निर्भय नारायण सिंह दूसरे स्थान पर रहे। 1980 में कांग्रेस (आई) के टिकट पर निर्भय नारायण सिंह ने तीसरी बार जीत दर्ज की। 1985 में लोकदल के टिकट पर शिव मंगल सिंह जीते, जबकि 1989 में जनता पार्टी के राजधारी ने बाजी मारी।
90 का दशक: राजनीतिक उथल-पुथल और नए दलों का उभार
1989 के बाद राज्य की राजनीति में आए बदलावों की गवाही सिकंदरपुर ने भी दी:
-
1991: राम लहर के दौर में कांग्रेस के मारकंडेय ने जनता पार्टी के राजधारी को 10,700 वोटों से हराकर जीत दर्ज की।
-
1993: समाजवादी पार्टी (SP) ने पहली बार इस सीट पर खाता खोला और दीनानाथ चौधरी ने जनता दल के राजधारी को 6,949 वोटों से हराया।
-
1996: सोशल एक्शन पार्टी (SAP) के टिकट पर राजधारी ने सपा के जियाउद्दीन रिजवी को 13,103 वोटों से हराकर जीत हासिल की।
2002 से 2022: सपा, बसपा और भाजपा के बीच मुकाबला
2000 के बाद सिकंदरपुर की राजनीति में जियाउद्दीन रिजवी एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे, लेकिन सीट पर किसी एक दल का वर्चस्व कायम नहीं रहा:
-
2002: समाजवादी पार्टी के जियाउद्दीन रिजवी ने समता पार्टी के राजधारी को 7,363 वोटों से हराकर पहली बार जीत हासिल की।
-
2007: बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की। बसपा के श्रीभगवान ने सपा के जियाउद्दीन रिजवी को 7,999 वोटों से हराया।
-
2012: सपा के जियाउद्दीन रिजवी ने जोरदार वापसी की और बसपा के चंद्रभूषण राजभर को 28,531 वोटों के बड़े अंतर से मात दी।
-
2017: मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सिकंदरपुर सीट पर पहली बार भगवा फहराया। भाजपा के संजय यादव ने सपा के जियाउद्दीन रिजवी को 23,548 वोटों से हराया।
-
2022: 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के जियाउद्दीन रिजवी ने तीसरी बार इस सीट पर वापसी की। उन्होंने कड़े मुकाबले में भाजपा के निवर्तमान विधायक संजय यादव को 11,855 वोटों से हराया। रिजवी को 75,446 और संजय यादव को 63,591 वोट मिले, जबकि बसपा के संजीव कुमार वर्मा 29,604 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
