2000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर चार्ज का रास्ता साफ, जानें नया नियम

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Gautam Kumar Agarwal
Gautam Kumar Agarwal

सरकार ने डिजिटल पेमेंट को लेकर एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है, जिसके तहत सिर्फ दो इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट माध्यमों को ही पूरी तरह चार्ज-फ्री श्रेणी में रखा गया है। इसमें RuPay डेबिट कार्ड से किया गया पेमेंट और 2 हजार रुपए तक का UPI लेनदेन शामिल है। नए नियमों के मुताबिक, बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर इन दो माध्यमों से पैसा भेजने या लेने पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई चार्ज नहीं ले सकेंगे। इस नोटिफिकेशन के साथ ही 2 हजार रुपए से ज्यादा के UPI पेमेंट अब इस खास कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो गए हैं, जिससे बड़े लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगने की संभावनाओं ने जोर पकड़ लिया है।

अगस्त 2026 के कानून से खुला कानूनी रास्ता

यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। अगस्त 2026 में संसद ने ‘टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) एक्ट, 2026’ पास किया था, जिसके जरिए ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ की धारा 10ए में संशोधन किया गया। इस कानून ने सरकार को डिजिटल पेमेंट पर फीस लगाने और हटाने का अधिकार दे दिया।

हालांकि, ग्राहकों के लिए फौरी तौर पर राहत की बात यह है कि नए नोटिफिकेशन में 2 हजार रुपए से ज्यादा के UPI पेमेंट पर अभी कोई नई फीस तय नहीं की गई है। अगर कोई व्यक्ति 5,000 या 10,000 रुपए का UPI पेमेंट करता है, तो उसके खाते से कोई चार्ज नहीं कटेगा। सरकार ने फिलहाल केवल भविष्य में बड़े UPI पेमेंट पर फीस लगाने के लिए एक वैधानिक रास्ता खोला है।

2000 रुपये की लिमिट के पीछे का गणित

इस विशेष लिमिट को तय करने के पीछे सरकार के पास स्पष्ट आंकड़े हैं। भारत में UPI से होने वाले ज्यादातर रोजमर्रा के लेनदेन (किराना, चाय, ऑटो किराया) 2 हजार रुपए से कम के होते हैं, जो इस सुरक्षा के दायरे में बने रहेंगे। इसके अलावा, बजट 2026-27 में सरकार ने 2 हजार रुपए से कम के UPI और RuPay ट्रांजैक्शन पर सब्सिडी देने के लिए 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। सरकार का तर्क है कि अगर कोई फीस लगाई जाती है, तो वह 2 हजार रुपए से ज्यादा के कारोबारी लेनदेन (शोरूम, बड़े रिटेलर) पर होनी चाहिए, न कि आम आदमी पर।

सब्सिडी के सहारे चल रहा 20,700 करोड़ का खर्च

फीस के विकल्प पर विचार करने की सबसे बड़ी वजह यूपीआई का संचालन खर्च है। पेमेंट कंपनियों का अनुमान है कि UPI को चलाने, उसकी साइबर सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर की सालाना लागत करीब 20,700 करोड़ रुपए है। इसके मुकाबले सरकार की 2,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी इंडस्ट्री की कुल लागत का सिर्फ 11 प्रतिशत ही कवर कर पाती है।

UPI के आकार को देखें तो अगस्त 2026 में इस प्लेटफॉर्म पर 29.82 लाख करोड़ रुपए की वैल्यू के करीब 2,451 करोड़ लेनदेन हुए, जो रोजाना औसतन 79.1 करोड़ ट्रांजैक्शन बैठता है। सरकार का मानना है कि इतने बड़े सिस्टम को केवल सब्सिडी पर निर्भर नहीं रखा जा सकता।

ग्राहक नहीं, कारोबारियों पर पड़ सकता है बोझ

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि UPI पेमेंट पर ग्राहकों से कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा। साथ ही पर्सन टू पर्सन (P2P) ट्रांजैक्शन पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। अगर भविष्य में MDR लागू होता है, तो यह फीस पेमेंट स्वीकार करने वाले कारोबारी से वसूली जाएगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, NPCI की अगुवाई वाली एक कमेटी 40 बेसिस पॉइंट्स (0.4 प्रतिशत) के MDR पर विचार कर रही है। इसे जारी करने वाले बैंक (40%), ऐप प्रोवाइडर्स (30%) और एक्वायरिंग बैंक (30%) के बीच बांटा जा सकता है। यह प्रस्ताव उन कारोबारियों पर लागू होने की संभावना है जिनका सालाना टर्नओवर 1 से 1.5 करोड़ रुपए के बीच है। Jefferies के अनुमान के मुताबिक, इस व्यवस्था से पेमेंट इंडस्ट्री को सालाना 5 से 10 हजार करोड़ रुपए की कमाई हो सकती है।

नोटिफिकेशन में कई सवालों के जवाब बाकी

नए नोटिफिकेशन में अभी कई तकनीकी पेंच बाकी हैं। इसमें नियम लागू होने की कोई स्पष्ट तारीख नहीं दी गई है और न ही 2019 के पुराने नोटिफिकेशन को सीधे तौर पर रद्द करने का कोई जिक्र है। इसके अलावा, पर्सन टू पर्सन (P2P) और पर्सन टू मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन को भी अलग-अलग स्पष्ट नहीं किया गया है। जब तक सरकार की ओर से फीस का नया ढांचा और दरें तय नहीं की जातीं, तब तक आम आदमी के लिए किसी भी अमाउंट का UPI लेनदेन पहले की तरह ही काम करता रहेगा।