ब्रिक्स बनाम नाटो: सैन्य टकराव की तुलना गलत, असली जंग तो व्यवस्था की है

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Prabhash Bahadur Civil Services Mentor
Prabhash Bahadur Civil Services Mentor

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक नेताओं की बैठकों से एक सवाल बार-बार सतह पर आता रहा—क्या ब्रिक्स कभी नाटो का मुकाबला कर सकता है? कौन ज्यादा ताकतवर है?

इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है, क्योंकि दोनों संगठन बिल्कुल अलग उद्देश्यों और बुनियादी ढांचे के साथ बने हैं। जहां नाटो एक विशुद्ध सैन्य गठबंधन है, वहीं ब्रिक्स एक आर्थिक और राजनीतिक मंच है। फिर भी, उनकी क्षमताओं की तुलना करना वैश्विक शक्ति संतुलन को समझने का एक प्रभावी तरीका है।

उद्देश्य का बुनियादी फर्क

  • नाटो (NATO): यह सामूहिक रक्षा का एक सैन्य संगठन है। इसके अनुच्छेद-5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसकी सैन्य कमान एकीकृत है, रणनीतिक योजनाएं साझा हैं और नियमित रूप से सैन्य अभ्यास किए जाते हैं।

  • ब्रिक्स (BRICS): यह व्यापार, विकास, वित्तीय सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार लाने वाला मंच है। इसमें कोई सामूहिक रक्षा संधि नहीं है। इसके सदस्य देश—भारत, चीन, रूस और ब्राजील—अपनी स्वतंत्र विदेश और रक्षा नीतियों के तहत फैसले लेते हैं। इसलिए ब्रिक्स को सैन्य गुट मानकर नाटो से तुलना करना इसके मूल स्वरूप को नजरअंदाज करना है।

सैन्य ताकत में नाटो आगे, जनशक्ति में ब्रिक्स मजबूत

  • रक्षा बजट: इस मामले में नाटो स्पष्ट रूप से आगे है। इसका संयुक्त सैन्य बजट 1.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जिसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 935 बिलियन डॉलर है। इसके विपरीत, ब्रिक्स देशों का संयुक्त रक्षा खर्च लगभग 480 बिलियन डॉलर है (जिसमें चीन का हिस्सा सबसे बड़ा है)। इससे नाटो को आधुनिक हथियार प्रणालियों, वैश्विक सैन्य अड्डों और लंबी दूरी की तैनाती में बड़ी बढ़त मिलती है।

  • सैनिक और पारंपरिक हथियार: जनशक्ति (Manpower) के मामले में ब्रिक्स मजबूत है। इसके सक्रिय सैन्य कर्मियों की संख्या 5 मिलियन से अधिक है, जिसमें चीन, भारत और रूस की बड़ी सेनाएं शामिल हैं। वहीं, नाटो के 32 सदस्यों के पास कुल मिलाकर करीब 3.3 मिलियन सक्रिय सैनिक हैं। जमीनी युद्ध के लिए ब्रिक्स के पास टैंक और तोपखाने बड़े पैमाने पर हैं, लेकिन आधुनिक युद्ध सिर्फ संख्या से नहीं लड़े जाते।

  • परमाणु, हवा और समुद्र: परमाणु हथियारों के मामले में दोनों लगभग बराबरी पर हैं। रूस, चीन और भारत के पास कुल मिलाकर 6,000 से अधिक परमाणु हथियार हैं, जबकि नाटो (अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन) के पास 5,800 से अधिक हैं। हालांकि, हवाई और नौसैनिक ताकत (फाइटर जेट्स, एयरक्राफ्ट कैरियर और सर्विलांस नेटवर्क) के मामले में नाटो तकनीकी रूप से काफी आगे है।

आर्थिक ताकत और व्यवस्था की जंग

नॉमिनल जीडीपी के लिहाज से नाटो देश और अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका मजबूत स्थिति में है। लेकिन परचेसिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर ब्रिक्स देश दुनिया की अर्थव्यवस्था का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं। बड़ी आबादी, ऊर्जा संसाधन, खनिज संपदा और विशाल उत्पादन क्षमता ब्रिक्स को दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती देती है।

ब्रिक्स, नाटो जैसा सैन्य गठबंधन बनने की होड़ में नहीं है। नाटो जहां एक स्थापित पश्चिमी सैन्य-राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक है, वहीं ब्रिक्स उभरती हुई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है, जहां पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दी जा रही है। 21वीं सदी की यह सियासत सिर्फ सैन्य बजट या सैनिकों की संख्या से तय नहीं होगी, बल्कि यह तकनीक, आर्थिक निर्भरता और वैश्विक संस्थाओं पर प्रभाव से तय होगी।