100 साल से ज्यादा पुराना है बुलेटप्रूफ जैकेट का इतिहास, इसे खरीद सकते हैं?

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव और सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर 52 नेताओं को बुलेटप्रूफ जैकेट देने की बात सामने आई है। इनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं। सुरक्षा में इस्तेमाल होने वाला यह जैकेट आज आधुनिक Body Armor का हिस्सा है, लेकिन इसकी कहानी नई नहीं है। शुरुआती दौर में रेशम की परतों से लेकर आज के Kevlar और हार्ड आर्मर तक, इस सुरक्षा कवच ने लंबा सफर तय किया है।

लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट आखिर काम कैसे करती है? गोली की ताकत को रोकने के पीछे कौन-सी तकनीक होती है? और भारत में क्या कोई आम नागरिक भी इसे खरीद सकता है? इन सवालों का जवाब समझने के लिए पहले इसकी कहानी पर नजर डालना जरूरी है।

रेशम की परतों से शुरू हुई बुलेट सुरक्षा की कहानी

बख्तरबंद वाहनों से जुड़ी कंपनी Armormax के अनुसार, गोली से सुरक्षा देने वाले बॉडी आर्मर का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है।

19वीं सदी में अमेरिकी सर्जन जॉर्ज ई. गुडफेलो ने देखा था कि रेशम की कई परतें गोली की गति को कम कर सकती हैं। इसके बाद करीब 1893 में पादरी कैसिमिर जेग्लेन ने रेशम की परतों से शुरुआती बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट तैयार की।

Armormax के अनुसार, जेग्लेन से जुड़ी कंपनी Second Chance Body Armor को शुरुआती बुलेटप्रूफ जैकेट निर्माताओं में माना जाता है। इसी वजह से कैसिमिर जेग्लेन का नाम इस तकनीक के शुरुआती विकास से जोड़ा जाता है।

यानी आज जिस Body Armor को हाईटेक सुरक्षा उपकरण के तौर पर देखा जाता है, उसकी शुरुआती तकनीक में एक साधारण लेकिन मजबूत प्राकृतिक फाइबर यानी रेशम की अहम भूमिका थी।

युद्ध के साथ बदली बॉडी आर्मर की तकनीक

समय के साथ हथियारों की क्षमता बढ़ी तो उनसे बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाले सुरक्षा कवच में भी बदलाव आया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ्लैक जैकेट का इस्तेमाल किया गया। इनका उद्देश्य मुख्य रूप से धमाकों से निकलने वाले टुकड़ों यानी fragments से सैनिकों को बचाना था।

Body Armor की तकनीक में एक बड़ा बदलाव 1965 में आया, जब अमेरिकी केमिस्ट Stephanie Kwolek ने Kevlar फाइबर विकसित किया। आगे चलकर इसी तरह के मजबूत और हल्के फाइबर का इस्तेमाल बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट में होने लगा।

1970 के दशक में Kevlar आधारित हल्के बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट बाजार में आने लगे। इसके बाद Body Armor लगातार विकसित होता गया और अलग-अलग खतरों के हिसाब से सॉफ्ट और हार्ड आर्मर की तकनीक सामने आई।

भारत में भी आधुनिक तकनीक पर आधारित बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट का निर्माण किया जाता है।

गोली लगने पर जैकेट शरीर को कैसे बचाती है?

बुलेटप्रूफ जैकेट को समझने के लिए एक बात साफ करना जरूरी है। इसे हर तरह की गोली के खिलाफ अजेय सुरक्षा कवच मानना सही नहीं है। अलग-अलग जैकेट अलग तरह के खतरों और हथियारों के लिए डिजाइन की जाती हैं।

सॉफ्ट Body Armor में इस्तेमाल होने वाले मजबूत फाइबर गोली की ऊर्जा को फैलाने और सोखने का काम करते हैं। इससे गोली के शरीर में सीधे प्रवेश करने की संभावना कम होती है।

लेकिन ज्यादा ताकत वाली राइफल की गोलियों के खिलाफ केवल सॉफ्ट आर्मर पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसे मामलों में हार्ड आर्मर प्लेटों का इस्तेमाल किया जाता है। स्रोत के मुताबिक, इनमें सिरेमिक, स्टील या पॉलीएथिलीन जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

इसलिए किसी जैकेट की सुरक्षा क्षमता उसके डिजाइन, इस्तेमाल की गई सामग्री और उसकी निर्धारित सुरक्षा रेटिंग पर निर्भर करती है।

क्या भारत में आम आदमी बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद सकता है?

भारत में आम नागरिक के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने पर कोई सामान्य प्रतिबंध नहीं बताया गया है। हालांकि, जैकेट खरीदने या इस्तेमाल करने से पहले लागू स्थानीय नियमों और परिस्थितियों की जानकारी लेना जरूरी है।

पत्रकार, सुरक्षाकर्मी या जोखिम वाले क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अपनी सुरक्षा के लिए Body Armor का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन इसे खरीदते समय सिर्फ कीमत या दिखावट देखकर फैसला करना पर्याप्त नहीं है।

खरीद से पहले जैकेट की सुरक्षा रेटिंग, प्रमाणपत्र और परीक्षण दस्तावेजों की जांच करना जरूरी है। इसके अलावा निर्माण की तारीख, वारंटी और एक्सपायरी डेट जैसी जानकारी भी देखनी चाहिए।

हर बुलेटप्रूफ जैकेट एक जैसी नहीं होती

Body Armor खरीदते समय सबसे अहम बात उसकी सुरक्षा क्षमता है। सामान्य जैकेट और बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

सॉफ्ट आर्मर आमतौर पर अलग तरह के खतरे के लिए बनाया जाता है, जबकि हार्ड प्लेट वाला आर्मर ज्यादा शक्तिशाली प्रोजेक्टाइल के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए जैकेट का चुनाव उसके संभावित इस्तेमाल और निर्माता द्वारा बताई गई सुरक्षा रेटिंग के आधार पर किया जाना चाहिए।

यूपी में 52 नेताओं को बुलेटप्रूफ जैकेट दिए जाने की खबर ने इस सुरक्षा उपकरण को फिर चर्चा में ला दिया है। लेकिन इसके पीछे की तकनीक एक दिन में विकसित नहीं हुई। रेशम की शुरुआती परतों से शुरू हुई यह तकनीक आज Kevlar, सिरेमिक और अन्य आधुनिक सामग्रियों तक पहुंच चुकी है।