अगर जानवरों की अदालत होती, तो इंसान सबसे बड़ा मुजरिम होता!

कभी-कभी सोचिए… अगर जानवरों का भी कोई धर्म होता, उनकी भी अदालतें होतीं, उनके भी अखबार निकलते, उनके भी नेता भाषण देते और वे भी इंसानों पर मुकदमे चलाते… तो शायद इतिहास की सबसे बड़ी चार्जशीट इंसानियत के खिलाफ होती।
आरोपों की लिस्ट लंबी होती।
“इंसान ने जंगल छीने।”
“इंसान ने घर उजाड़े।”
“इंसान ने हमारी आजादी को पिंजरों में बदला।”
“इंसान ने हमें खाने की चीज, मनोरंजन का साधन और प्रयोगशाला का सामान बना दिया।”
और फैसला शायद कुछ ऐसा आता—दुनिया का सबसे खतरनाक जीव कोई शेर, बाघ या सांप नहीं… बल्कि सूट-बूट पहनकर भाषण देने वाला इंसान है।
क्योंकि जानवर भूख में शिकार करता है, लेकिन इंसान लालच में पूरी प्रजातियां खत्म कर देता है।
जंगल उनका था, कब्जा हमारा हो गया
जिस जंगल में कभी हाथियों के झुंड चलते थे, वहां अब इंसान की कॉलोनियां खड़ी हैं। जिन रास्तों पर जानवर सदियों से चलते आए, वहां अब हाईवे दौड़ रहे हैं। जिन पेड़ों को धरती के फेफड़े कहा जाता है, उन्हें काटकर इंसान ने कंक्रीट के जंगल बना दिए।
मजेदार बात यह है कि इंसान खुद को “सभ्य” कहता है।
शायद सभ्यता की नई परिभाषा यही है कि जो जीव बोल नहीं सकता, उसकी जमीन ले लो। जो विरोध नहीं कर सकता, उसका घर छीन लो।
इंसान का सबसे बड़ा हुनर: दूसरों के दर्द को नजरअंदाज करना
जब कोई इंसान घायल होता है तो पूरी दुनिया मदद के लिए खड़ी हो जाती है। अस्पताल बनते हैं, दवाइयां आती हैं, अभियान चलते हैं।
लेकिन जब कोई जानवर सड़क पर घायल पड़ा होता है, तो अक्सर लोग अपनी गाड़ी की रफ्तार बढ़ा देते हैं।
क्यों?
क्योंकि इंसान ने दर्द की भी कैटेगरी बना दी है।
अपना दर्द—संवेदनशील मुद्दा।
दूसरों का दर्द—सिस्टम देखेगा।
और जानवर तो वैसे भी वोट नहीं देते।
पिंजरे में कैद आजादी
इंसान ने जानवरों के लिए शानदार शब्द भी खोज लिए हैं।
चिड़ियाघर को “संरक्षण केंद्र” कहा जाता है। कैद को “देखभाल” कहा जाता है। प्रदर्शन को “मनोरंजन” कहा जाता है।
एक शेर जंगल में राजा होता है, लेकिन इंसान के शहर में वही शेर लोहे की सलाखों के पीछे बच्चों के लिए फोटो बैकग्राउंड बन जाता है।
जिस हाथी को जंगल में किलोमीटरों चलना चाहिए, उसे छोटे बाड़े में खड़ा करके इंसान कहता है—देखो, कितना सुंदर जीव है।
शायद अगर जानवर बोल पाते तो पूछते—सुंदर हम हैं या आपकी क्रूरता?
धर्म, नैतिकता और इंसान का विरोधाभास
इंसान ने हजारों सालों में धर्म बनाए। हर धर्म ने दया, करुणा और प्रेम की बात की।
लेकिन उसी इंसान ने जानवरों के साथ व्यवहार के लिए अलग नियम बना दिए।
पूजा में फूल चाहिए, लेकिन उसी फूल को उगाने वाली धरती पर रहने वाले जीवों की चिंता नहीं।
अहिंसा का संदेश दिया जाता है, लेकिन सुविधाओं के लिए लाखों जीवों की जिंदगी खत्म कर दी जाती है।
इंसान अक्सर भगवान को खुश करने के तरीके ढूंढता है, लेकिन भगवान की बनाई हुई दूसरी रचनाओं के साथ कैसा व्यवहार करना है, यह भूल जाता है।
सबसे बड़ा मजाक: खुद को सबसे समझदार समझना
इंसान खुद को धरती का सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है।
लेकिन यही बुद्धिमानी जंगलों को खत्म कर रही है, नदियों को प्रदूषित कर रही है और जलवायु संकट पैदा कर रही है।
एक जानवर अपने रहने की जगह को नष्ट नहीं करता।
एक पक्षी अपने घोंसले में आग नहीं लगाता।
एक हाथी अपनी आने वाली पीढ़ियों का भोजन खत्म नहीं करता।
लेकिन इंसान भविष्य की चिंता करते हुए भी वर्तमान को बर्बाद करने में माहिर है।
अगर जानवरों की संसद होती…
कल्पना कीजिए, अगर जानवरों की संसद होती। हाथी अध्यक्ष होते और कहते—“इंसानों ने हमारे रास्ते बंद कर दिए।”
बाघ बोलता—“मेरे जंगल को खेत और शहर में बदल दिया।”
पक्षी शिकायत करता—“आसमान में इतना प्रदूषण भर दिया कि उड़ना मुश्किल हो गया।”
समुद्री जीव कहते—“पानी में इतना कचरा डाल दिया कि हमारा घर ही जहरीला हो गया।”
और अंत में कोई छोटा सा जीव खड़ा होकर कहता— “इन इंसानों को सबसे ज्यादा डर किस चीज से लगता है?”
दूसरा जवाब देता— “शायद सच से।”
सवाल इंसान से है
यह लेख इंसानों के खिलाफ कोई फैसला नहीं, बल्कि इंसान के व्यवहार पर एक सवाल है।
क्योंकि इंसान के पास सोचने की क्षमता है, बदलने की क्षमता है। वही हाथ जो जंगल काट सकते हैं, वही हाथ पेड़ भी लगा सकते हैं। वही दिमाग जो शोषण कर सकता है, वही दिमाग संरक्षण का रास्ता भी खोज सकता है।
लेकिन जब तक इंसान खुद को धरती का मालिक समझता रहेगा और बाकी जीवों को सिर्फ संसाधन मानता रहेगा, तब तक इतिहास का आईना यही दिखाएगा—
अगर जानवरों का कोई धर्म होता, तो शायद इंसान को सबसे बड़ा शैतान घोषित कर दिया जाता। क्योंकि जंगल के जानवर भूख से मारते हैं…
लेकिन इंसान अक्सर जरूरत से ज्यादा पाने की भूख में मारता है।
