इराक का तेल, अमेरिका का डॉलर सिस्टम और संप्रभुता की लड़ाई; बगदाद में क्यों उठ रहा बड़ा सवाल?

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बगदाद में बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि इराक अपना तेल किसे बेचता है। उससे बड़ा सवाल यह है कि तेल बेचकर मिले अरबों डॉलर पर अंतिम वित्तीय नियंत्रण और पहुंच की व्यवस्था किसके प्रभाव में चलती है। इसी सवाल को इराकी सशस्त्र समूह काताइब सय्यिद अल-शुहदा के महासचिव अबू अला अल-वलाई ने फिर उठाया है। शनिवार रात सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में उन्होंने अमेरिका पर इराक की आय और संपत्तियों पर आर्थिक व वित्तीय प्रभुत्व का आरोप लगाते हुए निर्यात बाजारों और बैंकिंग संबंधों में विविधता लाने की मांग की। उनका सवाल सीधा था—अगर किसी देश को अपनी अर्थव्यवस्था, संपत्ति और व्यापार मार्गों पर स्वतंत्र निर्णय का अधिकार नहीं है, तो उसकी संप्रभुता कितनी पूर्ण मानी जाए?

यह बयान ऐसे समय आया है जब इराक की अर्थव्यवस्था पहले से ही एक गंभीर संरचनात्मक कमजोरी से जूझ रही है। देश की सरकारी आय का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा 2025 में तेल से आया। यानी बगदाद की वित्तीय सेहत, सरकारी खर्च और आर्थिक स्थिरता का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल की बिक्री पर टिका है।

सवाल तेल का नहीं, डॉलर का है

इराक के मामले में अमेरिकी प्रभाव को समझने के लिए सबसे पहले तेल और डॉलर के बीच का संबंध समझना होगा। 2003 के अमेरिकी नेतृत्व वाले इराक आक्रमण के बाद देश के तेल राजस्व को सुरक्षित रखने और अंतरराष्ट्रीय दावों से बचाने के लिए एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था विकसित हुई, जिसमें इराक की तेल आय डॉलर के रूप में अमेरिकी वित्तीय तंत्र से होकर गुजरती रही। बाद में यह व्यवस्था इराक के केंद्रीय बैंक से जुड़े न्यूयॉर्क स्थित फेडरल रिजर्व खाते तक पहुंची। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार यही व्यवस्था वॉशिंगटन को इराक के डॉलर प्रवाह पर असाधारण वित्तीय leverage देती है।

लेकिन यहां एक जरूरी तथ्यात्मक अंतर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका इराक के तेल क्षेत्रों का मालिक है या सीधे इराक के तेल का राजस्व अपने खाते में ले लेता है। तेल इराक की संपत्ति है और उससे होने वाली सरकारी आय इराकी राज्य के वित्तीय ढांचे का हिस्सा है। विवाद उस व्यवस्था पर है जिसके जरिए इस आय का अंतरराष्ट्रीय डॉलर तंत्र में प्रबंधन और इस्तेमाल होता है।

2003 के बाद बनी वित्तीय व्यवस्था

इस कहानी की जड़ 2003 में जाती है। अमेरिकी नेतृत्व वाली Coalition Provisional Authority ने Development Fund for Iraq की स्थापना की थी। इसका मकसद इराक के तेल राजस्व को एक संरक्षित वित्तीय ढांचे में रखना था, ताकि युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और सरकारी खर्च के लिए धन उपलब्ध कराया जा सके तथा संपत्तियों को कानूनी दावों से सुरक्षा मिले। बाद में यह व्यवस्था इराक के केंद्रीय बैंक के न्यूयॉर्क फेड खाते से जुड़ गई।

समय के साथ इराक ने अपने वित्तीय संस्थानों और आर्थिक निर्णयों पर ज्यादा नियंत्रण विकसित किया। लेकिन डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से उसका जुड़ाव बना रहा। यही वह बिंदु है जहां आर्थिक संप्रभुता और वित्तीय स्थिरता के बीच तनाव पैदा होता है। बगदाद के लिए यह व्यवस्था एक तरफ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सुरक्षा और डॉलर तक पहुंच देती है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी वित्तीय प्रणाली के साथ निर्भरता भी बनाए रखती है।

अमेरिका के पास कितना leverage है?

इस सवाल का जवाब “पूरा नियंत्रण” कहना नहीं, बल्कि “महत्वपूर्ण प्रभाव” कहना ज्यादा सटीक है। इराक की अर्थव्यवस्था डॉलर पर निर्भर है और उसके तेल राजस्व का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय डॉलर प्रणाली से होकर गुजरता है। ऐसे में अमेरिकी वित्तीय नियम, प्रतिबंध व्यवस्था और डॉलर लेनदेन की निगरानी बगदाद के लिए महज तकनीकी विषय नहीं रह जाती।

अमेरिकी वित्त विभाग की इराक संबंधी प्रतिबंध व्यवस्था में भी स्पष्ट है कि कुछ आर्थिक गतिविधियां अमेरिकी प्रतिबंध कानूनों और लाइसेंसिंग व्यवस्था के अधीन हो सकती हैं। इससे यह समझ आता है कि अमेरिकी वित्तीय नियमों का असर इराक के कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन तक पहुंच सकता है।

यही वजह है कि इराकी आलोचक इसे वित्तीय संप्रभुता का सवाल बनाते हैं। उनका तर्क है कि अगर किसी देश की सबसे महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा आय ऐसी प्रणाली में रखी जाती है, जिस पर बाहरी शक्ति का नियामकीय प्रभाव है, तो उस देश की आर्थिक स्वतंत्रता पूरी तरह स्वायत्त नहीं कही जा सकती।

इराक की सबसे बड़ी कमजोरी

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा अमेरिका नहीं, खुद इराक की अर्थव्यवस्था है। देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास तेल के बाहर पर्याप्त मजबूत राजस्व आधार नहीं है। 2025 के लिए उपलब्ध आंकड़ों में तेल सरकारी आय का लगभग 88 प्रतिशत था और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भी तेल की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है।

इस निर्भरता का सीधा मतलब है कि तेल की कीमत गिरी, उत्पादन घटा या निर्यात मार्ग बाधित हुआ तो सरकार की आमदनी पर तुरंत असर पड़ता है। इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, सामाजिक खर्च और विकास परियोजनाएं भी उसी राजस्व पर निर्भर करती हैं।

यानी इराक की आर्थिक संप्रभुता पर सबसे बड़ा दबाव केवल किसी विदेशी शक्ति की वित्तीय भूमिका से नहीं आता। उसकी अपनी अर्थव्यवस्था का तेल पर अत्यधिक निर्भर होना भी उसे बाहरी झटकों के सामने कमजोर बनाता है।

2020 में सामने आया दबाव

अमेरिका और इराक के बीच वित्तीय निर्भरता की गंभीरता 2020 के राजनीतिक संकट में खास तौर पर चर्चा में आई थी। उस समय बगदाद अमेरिकी सैनिकों की वापसी की मांग कर रहा था। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार वॉशिंगटन ने इराक की न्यूयॉर्क फेड में रखी धनराशि तक पहुंच सीमित करने की संभावना का संकेत दिया था। इसके बाद इराक की स्थिति बदल गई और सैनिक वापसी को लेकर तत्काल टकराव आगे नहीं बढ़ा।

यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आर्थिक और सुरक्षा संबंधों के बीच का संबंध सामने आया। किसी देश की वित्तीय व्यवस्था पर प्रभाव तभी राजनीतिक leverage में बदलता है, जब उस देश के पास वैकल्पिक रास्ते सीमित हों। इराक के मामले में तेल आय और डॉलर प्रणाली पर भारी निर्भरता ने इस समीकरण को और संवेदनशील बनाया।

बैंकिंग रिश्ते बदलने की मांग

अबू अला अल-वलाई की मांग इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए। उनका जोर केवल अमेरिकी सैन्य उपस्थिति पर नहीं है। वह निर्यात बाजारों और बैंकिंग संबंधों को अलग-अलग देशों और वित्तीय केंद्रों तक फैलाने की बात कर रहे हैं। इसके पीछे मूल विचार यह है कि किसी एक वित्तीय प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता राजनीतिक दबाव की संभावना बढ़ाती है।

आर्थिक दृष्टि से diversification का तर्क नया नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा खरीदार, ज्यादा बैंकिंग चैनल और मजबूत गैर-तेल अर्थव्यवस्था किसी भी देश की bargaining power बढ़ा सकते हैं। लेकिन इराक के सामने समस्या यह है कि वैकल्पिक व्यवस्था बनाना सिर्फ राजनीतिक घोषणा से संभव नहीं है। इसके लिए मजबूत बैंकिंग संस्थान, अंतरराष्ट्रीय अनुपालन व्यवस्था, निवेश का भरोसा, मुद्रा स्थिरता और व्यापक गैर-तेल अर्थव्यवस्था चाहिए।

डॉलर से बाहर निकलना इतना आसान नहीं

इराक के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रभाव कम करना और डॉलर प्रणाली से पूरी तरह अलग होना दो अलग बातें हैं। पहली चीज कुछ हद तक विविधीकरण और संस्थागत सुधारों के जरिए संभव हो सकती है। दूसरी कहीं अधिक कठिन होगी।

इराक का विदेशी व्यापार, तेल कारोबार और वित्तीय तंत्र वैश्विक डॉलर व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है। अगर बगदाद अचानक वैकल्पिक मुद्राओं या बैंकिंग नेटवर्क की तरफ बढ़ता है, तो उसे विनिमय दर, भुगतान प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय अनुपालन से जुड़े नए जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि आर्थिक संप्रभुता की बहस में “अमेरिकी प्रभाव खत्म करो” कहना आसान है, लेकिन उसके बाद की वित्तीय संरचना बनाना बेहद कठिन काम है।

प्रतिबंधों का दूसरा पहलू

अमेरिकी दृष्टिकोण को समझे बिना तस्वीर अधूरी रहेगी। वॉशिंगटन की वित्तीय निगरानी केवल इराक के खिलाफ किसी व्यापक आर्थिक नीति के रूप में नहीं देखी जा सकती। अमेरिकी सरकार ने इराक के रास्ते ईरानी तेल की तस्करी और प्रतिबंधों से बचने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई भी की है। सितंबर 2025 में अमेरिकी वित्त विभाग ने ऐसे नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए थे, जिन पर ईरानी तेल को इराकी तेल के रूप में बेचकर अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने का आरोप था।

यानी अमेरिकी वित्तीय नियंत्रण की आलोचना के साथ यह तथ्य भी मौजूद है कि वॉशिंगटन इसे प्रतिबंधों के अनुपालन और ईरान से जुड़े वित्तीय नेटवर्क को रोकने के औजार के रूप में देखता है। इसीलिए पूरे मामले को केवल “अमेरिका इराक का पैसा रोकता है” जैसे एकतरफा निष्कर्ष में बदलना पत्रकारिता की दृष्टि से अधूरा होगा।

इराक के लिए असली लड़ाई

इराक अगर वास्तव में आर्थिक संप्रभुता मजबूत करना चाहता है तो उसे सिर्फ बैंकिंग संबंधों का diversification नहीं करना होगा। उसे अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से बाहर निकालना होगा। कर संग्रह बढ़ाना होगा, निजी क्षेत्र मजबूत करना होगा, बिजली और बुनियादी ढांचे की समस्याओं को कम करना होगा और ऐसी वित्तीय संस्थाएं विकसित करनी होंगी जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसेमंद मानी जाएं।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि इराक की गैर-तेल आय अब भी बेहद छोटी है और सरकारी खर्च का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन तथा अन्य अनिवार्य मदों में चला जाता है। यही संरचना सरकार के लिए आर्थिक संकट के समय विकल्प सीमित करती है।

इसका मतलब यह है कि आर्थिक संप्रभुता का सबसे मजबूत रास्ता शायद किसी एक देश से दूरी बनाना नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को इतना विविध बनाना है कि किसी एक देश, मुद्रा या बाजार पर निर्भरता निर्णायक न रह जाए।

बड़ी तस्वीर क्या कहती है?

अबू अला अल-वलाई का बयान इराक के भीतर मौजूद उस राजनीतिक असंतोष को सामने लाता है जो 2003 के बाद बनी आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से मौजूद है। लेकिन बयान एक राजनीतिक पक्ष का है, इसलिए उसके आरोपों को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। तथ्य यह है कि अमेरिका का इराक के डॉलर आधारित तेल राजस्व तंत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव है; यह भी तथ्य है कि इराक की सरकारी आय का अत्यधिक बड़ा हिस्सा तेल से आता है; और यह भी तथ्य है कि बगदाद ने पिछले वर्षों में अपनी वित्तीय स्वायत्तता और आर्थिक विविधीकरण बढ़ाने की कोशिश की है।

सवाल इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि इराक के तेल डॉलर कहां रखे जाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि एक संप्रभु देश अपनी सबसे महत्वपूर्ण आय, अपनी मुद्रा, अपने बैंकिंग नेटवर्क और अपने व्यापारिक रास्तों पर कितना स्वतंत्र निर्णय ले सकता है।