UP Election 2027: यादवों से ज्यादा कुर्मियों पर क्यों टिकी BJP-SP की नजर? समझिए पूरा सियासी गणित
गौरव त्रिपाठी – रेजिडेंट एडिटर
UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं। इस बार खास बात यह है कि यादव और जाटव जैसे पारंपरिक वोटबैंक के साथ कुर्मी समाज को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता तेजी से बढ़ी है। आखिर कुर्मी वोट इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ सीटों का गणित नहीं होता, बल्कि सामाजिक समीकरणों की ऐसी पहेली होती है जिसमें एक-दो प्रतिशत वोट भी कई सीटों का परिणाम बदल सकते हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अब कुर्मी वोटबैंक इसी वजह से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
भाजपा ने संगठन में कुर्मी चेहरे को अहम जिम्मेदारी दी है तो समाजवादी पार्टी भी गैर-यादव ओबीसी वोटरों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कुर्मी समाज को लेकर दोनों प्रमुख दलों में इतनी दिलचस्पी क्यों बढ़ी है?
कुर्मी वोटरों का इतना बड़ा राजनीतिक महत्व क्यों?
कुर्मी समाज को उत्तर प्रदेश के प्रमुख गैर-यादव ओबीसी समूहों में गिना जाता है। इसकी मौजूदगी खासतौर पर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है।
2001 में यूपी सरकार से जुड़ी हुकुम सिंह समिति की रिपोर्ट में कुर्मी और पटेल समुदाय की आबादी करीब 7.4 प्रतिशत बताई गई थी। हालांकि प्रदेश में जातिवार विस्तृत आधिकारिक जनगणना आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण मौजूदा आबादी के आंकड़ों को अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
सियासी महत्व सिर्फ आबादी से नहीं बनता। असली ताकत यह है कि कई विधानसभा सीटों पर कुर्मी वोट चुनाव का रुख प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
भाजपा के लिए कुर्मी क्यों हैं खास?
2014 के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने की रणनीति पर खास जोर दिया। इसमें कुर्मी समाज और अपना दल (एस) के साथ गठबंधन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्वतंत्र देव सिंह, पंकज चौधरी समेत कई कुर्मी नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका मिलती रही है। यही वजह है कि भाजपा के लिए कुर्मी सिर्फ एक जातीय समूह नहीं, बल्कि OBC सोशल इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में 2027 से पहले पार्टी उन सामाजिक समूहों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जिन्होंने पिछले चुनावों में उसका साथ दिया था।
सपा भी क्यों कर रही है कुर्मियों पर फोकस?
समाजवादी पार्टी की पारंपरिक राजनीति लंबे समय तक यादव-मुस्लिम समीकरण के आसपास देखी जाती रही है। लेकिन अखिलेश यादव ने पिछले कुछ चुनावों में इस दायरे को बढ़ाकर PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश की है।
इस रणनीति में गैर-यादव ओबीसी समुदाय बेहद महत्वपूर्ण हैं और कुर्मी उनमें प्रमुख हैं।
यही वजह है कि सपा संगठन और चुनावी राजनीति में कुर्मी नेताओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। पार्टी के सामने चुनौती साफ है: यादव वोट के साथ गैर-यादव पिछड़ों का बड़ा हिस्सा भी अपने साथ जोड़ा जाए।
कुर्मी किसी एक पार्टी के ‘स्थायी वोटर’ क्यों नहीं?
यही कुर्मी समाज की राजनीतिक ताकत का सबसे दिलचस्प पहलू है।
यादव वोट को लंबे समय तक सपा के साथ मजबूती से जोड़ा जाता रहा है, जबकि जाटव वोट का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ रहा है। लेकिन कुर्मी मतदाता किसी एक पार्टी के साथ उसी तरह स्थायी रूप से नहीं जुड़ा है।
इसी वजह से भाजपा और सपा दोनों के लिए यह फ्लोटिंग और प्रभावशाली OBC वोट बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है।
जिस पार्टी को कुर्मी मतदाताओं का पर्याप्त समर्थन मिलता है, उसे कई क्षेत्रों में सीधा चुनावी फायदा हो सकता है।
70-80 सीटों पर असर की चर्चा
राजनीतिक विश्लेषणों में अक्सर कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश की करीब 70 से 80 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाता प्रभाव डालने की स्थिति में हैं। कुछ क्षेत्रों में उनका प्रभाव निर्णायक स्तर तक पहुंच जाता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर ऐसी सीट पर कुर्मी ही जीत-हार तय करते हैं। चुनाव का परिणाम उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, दूसरे जातीय समूहों और पार्टी के गठबंधन समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।
लेकिन इतना जरूर है कि कुर्मी वोट को नजरअंदाज करके यूपी का बड़ा चुनावी सामाजिक समीकरण बनाना मुश्किल है।
2027 में असली मुकाबला सिर्फ BJP बनाम SP नहीं
कुर्मी वोट को लेकर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है।
भाजपा की कोशिश है कि उसका गैर-यादव ओबीसी आधार मजबूत बना रहे। वहीं सपा चाहती है कि PDA के जरिए वह यादवों से आगे बढ़कर दूसरे पिछड़े समुदायों में अपनी पकड़ मजबूत करे।
यानी 2027 में मुकाबला सिर्फ BJP vs SP नहीं होगा। इसके पीछे एक और बड़ा मुकाबला चलेगा:
कौन गैर-यादव OBC वोटरों को अपने पाले में ज्यादा मजबूती से ला पाता है?
और इस सवाल का जवाब तय करने में कुर्मी वोटबैंक की भूमिका काफी अहम हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज को लेकर अचानक बढ़ी सक्रियता महज संयोग नहीं है। यह उस बड़े चुनावी गणित का हिस्सा है जिसमें राजनीतिक दल अब सिर्फ अपने पारंपरिक वोटबैंक पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
भाजपा के लिए कुर्मी OBC आधार को मजबूत रखने की कुंजी हैं, जबकि सपा के लिए वे PDA विस्तार की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
2027 में किसे फायदा मिलेगा, यह चुनाव के वक्त बनने वाले गठबंधन और स्थानीय समीकरण तय करेंगे। लेकिन अभी से एक बात साफ है: यूपी की सियासी बिसात पर कुर्मी वोट को नजरअंदाज करना किसी भी बड़े दल के लिए महंगा पड़ सकता है।
